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श्रद्धांजलि : धीरज........ जिसके ना होने से हम सब धीरज खो रहे है!

ये मेरा मुगालता यानी वहम भी हो सकता है जिसे मैं हमेशा मानता हँू कि आत्महत्या हत्या से बडा साहस या दुसाहस का काम है। ये वो फैसला है जिसे समय व्यक्ति जिन्दगी के उपवन में खड़े होते हुए भी मौत के मुहाने पर खडे लेकर लेता है। जिन्दगी उसकी इच्छा होती है और मौत की बहुत गहरी वजह जिसे बाद का समाज खोजने का दावा भी करे तो इन्सान के उस समय के जज्बात को समझा नहीं जा सकता, जो समय वो इस निणर्य को लेते हुए जी चुका होता है। बेशक उन कागजों के पन्नों के राज कुछ भी रहे जिसे धीरज ने अन्तिम यात्रा से पहले संजोने की कोशिश की, पर उन पीडा के पक्षियों को ........हम नहीं पकड सकते जिन्होंने धीरज के मन में जन्म लिया और धीरज अपने साथ उन्हें भी मुक्त कर दिया। आप देखे पांच पन्नों को उसने लिखा पर उस धीरज नाम की कलम को अभी भी बहुत कुछ लिखना था अभी स्क्रीट और भी थी पर मुक्ति का दवाब इस कदर ज्यादा था कि उसे लेटलतीफी स्वीकार नहीं हो रही थी। दोराहें की सभी बात करते है पर धीरज ने र्थडवे की बात की,उसे स्थापित करने में अपनी उर्जा को उसने लगा रखा था। 
कई मित्र इस समय गहरा मानसिक विषाद भी झेल रहे है उन्हें लगता है कि अगर उनकी धीरज से बात हो जाती तो शायद ये दुख:द हादसा इतिहास में दर्ज ना होता। एक मित्र उसका फोन ना अटेन्ड न कर पाने के लिए खुद को माफ नहीं कर पा रहे। जिससे इस मर्म को समझा जा सकता है कि धीरज पत्रकारिता में ही नहीं, प्यार से हर दिल में बस जाने में माहिर था। सोशल साईट पर लगातार पोस्ट आ रहे है, पोस्ट अकसर औपचारिकता होते है पर इन पोस्टों को पढते हुए लगता है धीरज एक वट वृक्ष की तरह अपनी जंडे दूर तक फैला ले गया था कईयों के भीतर वो फिर से अंकुर बन फुट रहा है लुप्त नहीं हुआ। बडे भाई या छोटे भाई के सम्बध, दुख की अभिव्यक्ति आंसुओं संग शब्दों में हो रही है। ऐसा लगता है सब अपने शब्द संग दहाड़े मार कर रो रहे हैं। 
एक पत्रकार एक इन्सान भी होता है उसके भी अपने सुख-दुख,अपनी पीडा,अपना मान-सम्मान, अपने सपनें होते है। जिनके साथ 24 घण्टे सात दिन वो दर्जनों जिन्दगियों को भी जीता है। किसी सही न्युज की प्रंशसा उस तक पहुचे या ना पहुचें पर आलोचना पहुचनी तो तय होती ही है ऐसी ही कुछ जिन्दगी धीरज ने भी जी। शायद इसी आपोधाप में वो खुद को किसी के सामने खोल ही नहीं पाया और हम उसके नीजी, घनिष्ठ होने का दम भरते हुए आज सफर में अकेले है। पर नहीं, इसकी  एक वजह और रही होगी धीरज अपने मित्रों के चेहरों पर चिन्ता परेशानी कहां देखना चाहता था। अब तो बस बातें है कि धीरज ऐसा था,धीरज वैसा था कुछ नहीं है तो वो है धीरज, जिसके ना होने से हम सब धीरज खो रहे है।(नवल सिंह, प्रैसवार्ता) 

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