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‘‘श्री गुरू नानक देव जी’’

एकोएक परमातमा के लीला की गाना गाते हुए चार दिशा में चार उदासी करने वाले  श्री गुरू नानक देव जी 34 हजार मील से ज्यादा पदयात्रा किये थे। बाबा नानक के नाम सुनते ही सिख धर्म की कल्पना दिमाग में आ जाता है पर श्री गुरू नानक देव जी का सिद्धांत न सिर्फ एक सामुदाय तक सीमित है बल्कि दुनियां के हरेक इंसान के ऊपर लागू होती है क्योंकि इस ब्रम्हांड के मालिक का रूप को अति सुंदर तरह से कविता के रूप में  ‘‘श्री जप जी साहिब’’ में वर्णन करने वाले श्री गुरू नानक देव जी सब का मालिक एक है कहके सबको समझते हैं। श्री जप जी साहिब को ‘‘कन्नड़’’ भाषा में अनुवाद करने वाले मैं अपने आपको भाग्यशाली मानता हूं क्योंकि 500 साल के बाद अनुवाद होने वाले श्री जप जी साहिब को जब कर्नाटक में कन्नड़ लोगों मैंने दिया तो कर्नाटक के लोग श्री जप जी साहिब को मत्थे पर रखकर पूजा करने लगे है। यह घटना यह साबित करती है कि श्री गुरू नानक देव जी का सिद्धांत एक समुदाय या एक जगह तक सीमित नहीं है।
       आदिकाल में सत्य था, युगो-युग में सत्य रहेगा, अभी भी सत्य है और भविष्य में सत्य रहने वाला उस भगवान को श्री गुरू नानक देव जी ने श्री जप जी साहिब में उस तरह से वर्णन किया है जिस को पढ़कर कोई भी उस एकोएक श्री मान नारायण के नाद में लीन हो जाएगा। चारों दिशा में चार उदासी करने वाले श्री गुरू नानक देव जी 15वी सदी मेें धार्मिक क्रांति लाकर 12वीं सदी का याद दिला दिये थे। अपने पहले उदासी 1499 से लेकर 1506 तक लगातार 7 साल तक पूर्व दिशा में यात्रा किये थे। जब हरिद्वार पहुंच गए तो बाबा नानक ने देखा कि गंगा नदी में पंडितों ने पूर्व दिशा पर सूरज को गंगा जल अर्पण कर रहे थे। उसी गंगा नदी में खड़े होकर बाबा नानक ने पश्चिम की तरफ मूंह करके गंगा जल देने लगे। यह देखके पंडितो ने पूंछा कि ‘‘ पश्चिम दिशे में सूरज नहीं है, फिर उस दिशा में पानी क्यों दे रहे हो’’ इस प्रश्न का जवाब बड़ी निम्रता के साथ देने वाले बाबा नानक ने कहा कि ‘‘मैं पंजाब से हूंँ, पंजाब से आकर बहुत दिन हो गए, मेरे खेत के फसल को पानी दे रहा हूं’’ यह सुनकर पंडितो ने हंसते -हंसते कहा कि ‘‘तेरा दिया हुआ पानी तेरे खेत के फसल तक कैसे पहुंँच सकता है?’’ हंसते हुए पूंछने वाले पंडितो को बाबा नानक ने कहा कि ‘‘मेरा दिया हुआ पानी पंजाब के मेरे खेत तक नहीं पहुंचेगा पर, आप दिये हुए पानी सूरज तक कैसे पहुंच सकता है? ’’ बाबा नानक के यह प्रश्न का जवाब ढूढ़ते रहने वाले पंडितो ने बाबा नानक का अपार शक्ति पहचान के नानक के चरणो में आ गऐ थे।
       1506 से लेकर 1513 तक अपने दूसरी उदासी पर जाने वाले बाबा नानक कर्नाटक के बीदर को भी पहुंचे थे, जहां पर लोग पानी की समस्या से गुज़र रहे थे। बाबा नानक को देखकर बीदर के सारे लोग जन इकट्ठा होकर बाबा नानक को फरियाद किया कि पानी का इंतज़ाम करो। लोगों का दर्द समझने वाले बाबा नानक अपने पांव अंगुठे से एक पत्थर को हटाया जहां से पानी की झिरा निकल गई। नानक झिरा के नाम पे मशहूर होने वाले बीदर के लोग उस वक्त से लेकर अभी तक मिठास भरी पानी पी रहे हैं। मिठास भरी बोल बोलके पूरा दुनियां को जीतने वाले बाबा नानक जब अपने चौथी उदासी में जब मेक्का पहुंच गए थे तो बाबा नानक जी ने पांव सीधा करके सो गए थे। यह देखकर वहां के बाबा काजी को इतना गुस्सा आ गया कि सोते हुए बाबा नानक को उठा के पूंछा कि ‘‘ अल्लाह की ओर पांव करके क्यों सोए हो? बाबा नानक ने उस काज़ी को कहा ‘‘जिस दिशा में अल्लाह नहीं है उस दिशे की ओर मेरा पांव तुम ही घुमा दो’’ यह सुनकर काज़ी को यह एहसास हुआ कि अल्लाह तो हर दिशा में, हर कण-कण में रहता है। बाबा नानक के इस सलाह को समझने वाले काजी बाबा नानक के चरणों में आकर चरणदास हो गए थे।
       चरणदास तो उस एकोएक परमातमा के होने का सलाह देेने वाले बाबा नानक उस समाज की रचना करने के लिए कठोर तपस्या किये थे, जिस तपस्या कि वजह से सिख धर्म जैसे गुरू सिख भरी समाज बन चुका है। सिख धर्म का सि़द्धांत या बाबा नानक का सिद्धांत एक समुदाय या एक प्रांत तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे दुनियां के लिये बना हुआ है। ‘‘नानक नाम चड़दी कला तेरे पाणे सरबत दा पला’’  कहके हर रोज़ हज़ारों बार अरदास करने वाले बाबा नानक के भक्त उस एकोएक परमातमा के लीन में रहते है इसलिए दुनियां के सभी लोग अपना-अपना धर्म को पालन करते हुए उस श्री मान नारायण के नाद में एक होना चाहिए।
पंडितराव धरेनवर
                                                       सहायक प्रोफेसर, सरकारी कॉलेज
                                                       सैक्टर-46 चण्डीगढ़
                                                       Mob. 9988351695

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