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पत्थर से भी जमता है दही!

जैसलमेर(प्रैसवार्ता) पत्थर से भी दही जमता है! सुनने में यह बात भले ही अटपटी लगे, लेकिन यह सत्य है। जैसलमेर के हाबूर गांव के पत्थर से भी दही जमाया जा सकता है।
           कई शोधकर्ताओं द्वारा यह प्रमाणित किया जा चुका है कि इस पत्थर में ऐसे रासायनिक गुण विद्यमान है, जिसकी वजह से यह दूध में डालने के करीब 14 घंटे बाद यह दूध को दही में परिवर्तित कर देता है। हाबूर गांव के लोग तो ‘जमावन’ नहीं होने की स्थिति में आज भी इस ‘चमत्कारी’ पत्थर के टुकड़े से ही दही जमाते हैं। यह पत्थर जैसलमेर से 40 किलोमीटर दूर स्थित हाबूर क्षेत्र में ही पाया जाता है।
         कत्थई-गेरूएं रंग के धारीदार इस पत्थर के कई उपयोग है। इन दिनों जैसलमेर में बृजरतन ओझा बाबा महाराज तो इस पत्थर की कलाकृतियां बनवा कर देश-विदेश के सैलानियों को बेच रहे हैं। बतौर बाबा महाराज ‘यह पत्थर बड़ा कीमती है। इसकी तादाद सीमित हैं।’ बाबा महाराज के लघु उद्योग केंद्र में देश-विदेश की कई हस्तियां आ चुकी है। सभी इस पत्थर के बारे में उत्सुकता से जानना चाहते हैं। फर्श की सुंदरता बढ़ाने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है।
          बाबा महाराज ने बताया कि इस पत्थर के कई नाम है। कई लोग इसे हाबूर का छींटदार पत्थर, सुपारी, हरफी, दिलपाक, अजूबा, अभरी, महामरियम, दूध जमावणिया, भूत भगावणिया आदि नाम से पुकारते हैं। उन्होंने बताया कि इस पत्थर से मालाएं, फूलदान, प्याले, गिलास, बरछी, कुल्हाड़ी, प्लेट्स, ट्रे, ऐस्ट्रे, नगीने, पेंडेन्ट्स, एक्यूप्रेशर पेंसिल, पेपरवेट, अगरबत्ती स्टैंड, कैंडल स्टैंड, छतरी, गणेश, कप प्लेट्स व गणेश आदि कलाकृतियां बनाई जाती है।
        भू वैज्ञानिक नारायणलाल इणखिया मरु अमृता सरस्वती सेमिनार के दौरान इस पत्थर की कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगा चुके हैं। इस प्रदर्शनी में उन्होंने हाबूर के इस पत्थर के आइटमों का प्रदर्शन किया था। उनका कहना है कि इस पत्थर से दही जमना आम बात है। इस पत्थर के बारे में जानकारी मिली है कि साढ़े बारह करोड़ साल पुराने इस लाम स्टोन में ऐसे बैक्टीरिया के अंडज मौजूद हैं जो दही जमाने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
       जयनारायण व्यास विवि विज्ञान संकाय के सेवानिवृत्त डीन डाॅ. बीएस पालीवाल ने इस पत्थर पर खूब शोध किया है। इस पत्थर पर जैव रासायनिक परीक्षण करने के बाद उनका मानना है कि इस पत्थर में सूक्ष्म जैविक पदार्थ पाए गए हैं। अनुमान है कि लाइम स्टोन में समुद्री सीप के जीवाश्म विद्यमान है। यह क्षेत्र पूर्व में पानी वाला रहा है। कालांतर में मरुस्थल में बदल गया, लेकिन इस पत्थर में कुछ जीवाणु ऐसे रह गए जो दही जमाने में काम आते हैं। उनका मानना है कि इन जीवाश्मों में दही जमाने के तीनों बायो-केमिकल ऐमीनो एसिड, फिनायल एलीनिया और रिफ्टोफेन टायरोसीन विद्यमान है। इसके साथ ही इसमें लगभग साढ़े बारह करोड़ साल पुराने बैक्टीरिया के अंडज हो सकते हैं। इतने पुराने बैक्टीरिया के अंडजों का जिंदा होना वाकई आश्चर्यजनक है। स्टोन की बायो-कैमिस्ट्री काफी महत्वपूर्ण है, इसलिए इस पर गहन जांच करना जरूरी है।

उपचार में भी सहायक
       पूना के डाॅ. अली असगर के गिल्टवाला ने हाबूर के पत्थर से कई रोगों का सफल उपचार भी किया है। उनका मानना है कि इस पत्थर में ऐसे कई रासायनिक गुण विद्यमान हैं, जिससे कमजोरी, ब्लडप्रेशर, हार्ड ट्रबल, कूकर खांसी, डायबिटिज, मस्क्यूलर पेन व एड्स जैसे रोगों के उपचार में सहायता मिलती है। हाबूर पत्थर के विशेषज्ञ बृजरतन ओझा बाबा महाराज ने बताया कि डाॅ. अली असगर की सलाह के बाद उन्होंने डायबिटिज के उपचार में इस पत्थर का उपयोग किया है, जिससे उन्हें काफी राहत मिली है। डाॅ. अली असगर के अनुसार चर्म स्पर्श, बाॅल से एक्सरसाइज, एक्यूप्रेषर पेंसिल से इलाज और मसाज करने से विभिन्न रोगों में इसका फायदा होता है।

वास्तुशास्त्र में है महत्वपूर्ण
      बाबा महाराज ने बताया कि सैलाणागढ़ मध्यप्रदेश के महाराजा विक्रमसिंह इस पत्थर को वास्तुशास्त्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हैं। इस पत्थर से व्यापार में उतार-चढ़ाव दूर करने और संपन्नता के लिए पूजा-अर्चना भी की जाती है।

अब खत्म हो रहे हैं पत्थर
      हाबूर के इन छींटदार पत्थरों को अंधाधुंध दोहन होने से ये सिमट रहे हैं। गौरतलब है कि ये पत्थर केवल हाबूर गांव में ही मिलते हैं, इसके अलावा दुनिया में ये कहीं नहीं पाए जाते। इन पत्थरों का असंयमित दोहन होने से इनकी खाने अब कम ही रह गई है। यह पत्थर इतिहास की धरोहर है, लेकिन इस बचाने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किए जा रहे। इतिहासकार नंदकिशोर शर्मा का कहना है कि इस पत्थर को बचाने की जरूरत है। लोग व्यापारिक उपयोग कर रहे हैं।

विदेशियों को लुभाते हैं पत्थर के आइटम
      हाबूर के इस पत्थर के कई आइटम बनाए जाते हैं, जिसे विदेशी सैलानी खूब पसंद करते हैं। विदेशी सैलानी भ्रमण के बाद जब अपने देश लौटते हैं तो जाते समय यादगार के रूप में हाबूर के इस पत्थर से बने विभिन्न आइटम अपने साथ ले जाते हैं।

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