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पंजाब का मानवाधिकार आयोग स्वयं अधिकार से है वंचित

चंडीगढ़(प्रैसवार्ता)। वर्ष 1993 में प्रोटेक्शन ऑफ ह्यूमन राईटस एक्ट के अधीन पंजाब राज्य मानवाधिकार आयोग की स्थापना हुई थी, ताकि लोगों को मिले मानवाधिकारों को सुनिश्चित किया जा सके, मगर बुनियादी ढांचे, कानूनी शक्तियां, स्टॉफ, फंड व आवश्यक आवश्यकताओं की कमी से जूझ रहा है। प्रैसवार्ता को मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 2010 में आयोग को 19226, वर्ष 2011 में 16311, वर्ष 2012 में 18332, वर्ष 2013 में 16350 तथा वर्ष 2014 में 15423 शिकायतें मिली, जिनमें से ज्यादातर का निपटारा किया जा चुका है। आयोग हर शिकायत की गहन जांच उपरांत सुनवाई करके दोषी अधिकारी/कर्मचारी के खिलाफ संबंधित अॅथारिटी को कार्रवाई की सिफारिश करता है, जिस पर कार्रवाई वहीं अथॉरिटी करती है। जेलो और पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों के संबंध में जांच उपरांत पीडि़त पक्ष के लिए सरकार को हर्जाने की सिफारिश की जाती है। सरकार आगे वह पैसा संबंधित कर्मचारी व अधिकारी के संबंध में अपनी विभागीय जांच(यदि आवश्यक समझे) करवाकर उनके वेतन अथवा सेवा लाभों में से कटौती कर सकता है। वर्तमान में आयोग की वित्तीय स्थिति बेहद दयनीय है, जिसके चलते आयोग के लिए आरक्षित राशी भी समय पर नहीं मिलती, जिसका असर आयोग की प्रतिदिन की कार्रवाई पर पड़ रहा है। वर्ष 2006 में इस एक्ट में संशोधन करके राज्यों को कुछ विशेषाधिकार भी दिए गए थे, लेकिन उनके बावजूद राज्य मानवाधिकार आयोग अपने निर्णयों को कानूनी रूप एवं समयबद्ध अवधि के बीच अमल लाने में असमर्थ है। सूत्रों का मानना है कि पंजाब राज्य मानवाधिकार आयोग के चुने जाने वाले प्रतिनिधी कानूनविद अथवा अच्छी छवि वाले सूझवान हस्तियां होती है, जिनकी नियुक्ति के लिए मुख्यमंत्री, गृहमंत्री व विपक्षी दल के नेता तथा विधानसभा के स्पीकर द्वारा राज्य के राज्यपाल को सिफारिश की जाती है। नियुक्त किए चेयरमैन सहित अन्य पांच सदस्यों में पंजाब-हरियाणा  हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश चेयरपर्सन, एक सदस्य हाईकोर्ट के जज तथा दो अन्य लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि होते है।  वहीं आयोग का सचिव एक आईएएस अधिकारी होता है, जो शिकायतों की पडताल संबंधी जांच दल का नेतृृत्व करता है। आयोग द्वारा लिए जाने वालेे फैसले को सिर्फ एक सिफारिश के तौर पर भेजा जाता है। 

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