Headlines

Restaurants

Fashion

प्राचार्या की दबंगई, कई छात्र नहीं दे पाए परीक्षा

अजमेर(सुमित कलसी)। नार्थ वेस्टर्न रेलवे द्वारा आयोजित आरआरसी परीक्षा में रविवार फिर छात्र स्थानीय परीक्षा केंद्र के अधिकारियो के थोपे गए नए नियमो का शिकार हुए, जिसके चलते  कई लाचार छात्र परीक्षा देने से वंचित रह गए। कभी जन्म प्रमाण पत्र तो कभी फोटो पहचान पत्र का हवाला देकर छात्रों को परीक्षा केन्द्रो से बहार निकल दिया गया। जिन छात्रों के प्रमाण पत्र ऑनलाइन अपलोड थे, उन्होने नज़दीकी साइबर कैफ़े से प्रमाण पत्र की कॉपी निकल कर पेश की तो उन्हें समय खत्म होने का बहाना करके परीक्षा में बैठने नहीं दिया गया। इस विषय में राजेंद्र स्कूल के प्रिंसिपल ने जानकारी दी कि किसी भी पहचान पत्र की फ़ोटो कॉपी मान्य नहीं है। ओरिजिनल वोटर आई डी, आधार कार्ड  व अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करने पर ही प्रवेश दिया जाएगा, पर कई छात्रों के पास ओरिजिनल और सत्यापित प्रति होने के बावजूद भी प्रवेश नहीं देने पर अपना पल्ला झाड़ाते हुए मामला रेलवे अधिकारियो के मत्थे मंड दिया।  परीक्षा केंद्र के बहार और अंदर लगी सूचना पर भी ये कही नहीं अंकित था कि आपको ओरिजिनल कॉपी ही लेकर आनी है। वही संत कँवर राम आशा गंज की प्राचार्या सरस्वती मुरजानी ने तो खुल कर दबंगई दिखाई पहले तो मीडिया से बात करने से ही मना कर दिया और स्कूल का मैन गेट ही बंद कर दिया, पत्रकारों के बार-बार बोलने पर भी उनके द्वारा कोई तवज्जो नहीं दी गयी और चतुर्थ कर्मचारी से कहलवा दिया कि ''जिसको जो करना है करे, ये मेरा स्कूल है, मै किसी से नहीं डरती, यहाँ मेरी मंजूरी ही चलेगी"। जबकि कई पत्रकारों ने आग्रह भी किया कि जिन छात्रों के पास पूरे दस्तावेज है उन्हें कृप्या अंदर ले लिया जाए, पर सरस्वती देवी जी को ना किसी की विनती सुनाई दी और न ही छात्रों के आसुओ का कोई असर हुआ।  अंत तक उनके सैंटर के बहार ऐसे छात्रों की भीड़ लगी रही जिनको उम्मीद थी कि शायद कुछ देर बाद या अगले सत्र में उन्हें प्रवेश दे दिया जाए।  झुंझुनू से आये छात्र दिनेश कुमार मीणा ने जानकारी देते हुए बताया कि 10 बजे वो संत कंवर राम स्कूल पहुंच गया था मगर जन्म प्रमाण न होने पर उसे परीक्षा में बैठने से मना कर दिया। वहा मौजूद पर्यवेक्षक को उसने इस विषय में बात की जिन्होंने उसे 10:20 तक प्रतिलिपि लाने की अनुमति दी। दिनेश ने तुरंत पास के साइबर कैफ़े से दसवी की मार्कशीट की प्रतिलिपि निकलवाई और तकऱीबन 10:10 पर वो सैंटर पहुंच गया पर उसे फिर भी प्रवेश नहीं दिया गया। गरीब परिवार से आया दिनेश रो-रो कर अपनी दास्ता सुना रहा था, दबी आवाज़ में उसने कहा कि ''इससे अच्छा तो में मर ही जाता तो अच्छा रहता, मेरे पिताजी ने उधर पैसे लेकर मुझे इस परीक्षा की तयारी करवाई थी, मगर जब परीक्षा ही नहीं दे पाया तो अब किस मुह से घर जाउगा।" भगवान ना करे अजित या किसी और छात्र ने कोई गलत कदम उठा लिया तो उसका जिम्मेदार कौन होगा परीक्षा आयोजित करने वाला रेलवे विभाग या वो हिटलर प्राचार्य जिसने 10 मिनट पहले ही प्रवेश रोक दिया और छात्रों की मिन्नतों और आसुओ का भी कोई असर नहीं हुआ। इस संबंध में जब श्रीमति सरस्वती मुरजनी को फोन किया गया, तो उन्होंने फोन उठाना मुनासिब नहीं समझा।

Share this:

Post a Comment

 
Copyright © The Pressvarta Trust. Blog Templates Designed by OddThemes