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सिरसा के सिविल अस्पताल में ट्रामा सैंटर है या ड्रामा सैंटर

सिविल अस्पताल का एक अधिकारी
सिरसा(सुरेंद्र सरदाना)। सिविल अस्पताल, सिरसा का ट्रामा सैंटर इन दिनों ड्रामा सैंटर बना हुआ है। यहां के लगभग सभी वार्डों का सफाई जनाजा तो निकला ही हुआ है,इसके अलावा कुछ मरीजों को विभाग की ओर से बिस्तर उपलब्ध नहीं करवाया गया है। यहां न तो मरीजों की सही देखभाल होती है और न ही मरीजों को विभाग द्वारा जरूरी सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती है। कुछ इस तरह की दर्द भरी बातें एक अखबार के संवाददाता सुरेंद्र सरदाना के समक्ष मरीजों ने कही। बीती 23 जनवरी को मैडिकेयर अखबार के संवाददाता सुरेंद्र सरदाना सामान्य अस्पताल के ट्रामा सैंटर में मरीजों का हालचाल जानने पहुंचे, तो ऐसी हकीकत सामने आई, जिसे सुनकर वे दंग रह गए। उन्होंने तुरंत अपनी टीम के साथ ट्रामा सैंटर के लगभग सभी वार्डों का दौरा किया, तो पता चला कि ट्रामा सैंटर तो महज एक ड्रामा सैंटर है। यहां सफाई का जनाजा तो निकला हुआ है, साथ ही कुछ प्राईवेट एंबुलेंस संचालक मरीजों से मोलभाव कर रहे थे। वार्ड नम्बर 5 के एक मरीज ने संवाददाता सुरेंद्र सरदाना को बताया कि उनकी यहां कोई देखभाल नहीं हो रही। नियम तो यह बनता है कि विभाग उन्हें बिस्तर उपलब्ध करवाए, मगर ऐसा विभाग द्वारा नहीं किया गया है। उनकी हालत में सुधार होने की बजाए खराब हो रहा है, जिसका जिम्मेवार अस्पताल का निकम्मा प्रशासन है। वहां पर मौजूद एक अधिकारी से संवाददाता सुरेंद्र ने जब बात करनी चाही, तो जनाब ने जुबान नहीं खोली। ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर अमित से जब इस मरीज के बारे में संवाददाता ने जानना चाहा, तो डॉक्टर अमित ने कहा कि मुझे मरीज के बारे में कुछ खास जानकारी तो नहीं है, आप पूछ रहे है तो मैं बता देता हूं कि मरीज शायद 19 जनवरी को हमारे यहां आया था, उस वक्त मरीज को खून की उल्टी हो रही थी, हमने उसे प्राथमिक उपचार देकर उसकी खून की उल्टी तो बंद कर दी है, मगर मरीज को बीमारी क्या है, इसकी जानकारी मेरे पास नहीं है और न ही मरीज का कोई वारिस अभी तक यहा पहुंचा है। इतना कहते हुए डॉक्टर अमित ने संवाददाता को ट्रामा सैंटर में बने एमआर कॉल सैंटर में भेज दिया, जहां एक अधिकारी ने कहा कि आपको किसी मरीज के बारे में पूछने का कोई अधिकार नहीं है, संवाददाता के बार-बार पूछने पर अधिकारी ने कहा कि मरीज का नाम दर्शन सिंह है और वह पंजाब के मलोट का रहने वाला है। इस मरीज को ट्रामा सैंटर में एक एंबुलेंस 19 जनवरी 2015 को लेकर आई थी, जिस पर संवाददाता ने अधिकारी से एंबुलेंस का नम्बर पूछना चाहा, तो कर्मचारी आग बबूला होते हुए यह मामला मैं किसी अखबार में नहीं छपने दूंगा, कहकर संवाददाता को बाहर निकलने को कहा। संवाददाता ने जब मौके पर बैठे कर्मचारी की फोटो करनी चाही, तो अधिकारी ने कुर्सी से उठकर संवाददाता के मुंह पर दरवाजा बंद कर दिया, लेकिन तब तक फोटो खींची जा चुकी थी। अब सारे मामले की तरफ ध्यान दिया जाए, तो यह मामला संदिग्ध लगता है और ऐसे में पांच दिन गुजर जाने के बाद भी मरीज को इलाज न मिलना, मरीज को जीवन को लील सकता है। अगर स्वास्थ्य कर्मचारी मरीजों के साथ ऐसा बर्ताव करेंगे, तो निश्चय ही आमजन का विश्वास सरकारी अस्पताल की सेवाओं से उठ जाएगा। अब देखना यह होगा कि ट्रामा सैंटर में एडमिट दर्शन सिंह को इलाज से जीवन मिलता है या इलाज के अभाव में तड़प तड़प कर मरता है।

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