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लोकतांत्रिक चुनाव व्यवस्था पर 'लोक विश्वास' सबसे ज़रूरी

6:22:00 PM
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यह एक कड़वा सच है कि हमारे देश के सत्ताधीश आसानी से सत्ता से अलग नहीं होना चाहते। यही वजह है कि जब चुनाव में उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ता है तो वे अपनी हार की नाना प्रकार की दलीलें पेश करने लगते हैं। ऐसा ही एक सबसे आसान बहाना या दलील यह भी है कि चुनाव में बेईमानी की गई या चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी अथवा वोटिंग मशीन के माध्यम से घोटाला किया गया आदि। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद भी ऐसी ही आवाज़ बुलंद की गई। इस बार ईवीएम अर्थात् इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में धांधली का आरोप लगाने वाली सबसे मुखरित आवाज़ उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व बहुजन समाज पार्टी प्रमुख सुश्री मायावती की थी। इसके पश्चात उत्तराखंड में अपनी हार का मुंह देखने वाले हरीश रावत ने तथा पंजाब में प्रत्याशित सफलता प्राप्त न कर पाने वाले आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने भी मायावती के सुर से अपना सुर मिलाते हुए ईवीएम की विश्वसनीयता पर उंगली उठाई। सीधेतौर पर यह कहा जा सकता है कि चूंकि इन तीनों ही नेताओं की पार्टियों ने अपने-अपने राज्यों में पराजय का मुंह देखा इसलिए इन्हें ईवीएम द्वारा की गई मतदान प्रक्रिया अविश्वसनीय नज़र आ रही है। परंतु उक्त नेताओं द्वारा उठाई जाने वाली यह आवाज़ कोई पहली अथवा नई आवाज़ नहीं है। 
सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के कई वरिष्ठ नेता भी इसके पूर्व ईवीएम को अविश्वसनीय व संदिग्ध बताते हुए इस प्रणाली का विरोध कर चुके हैं। भाजपा प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हाराव तो ईवीएम की विश्वसनीयता पर प्रश्र उठाते हुए एक पुस्तक तक लिख चुके हैं।  2010 में प्रकाशित हुई 'डेमोक्रेसी एट रिस्क' नामक इस पुस्तक की प्रस्तावना लाल कृष्ण अडवाणी द्वारा लिखी गई है। इस पुस्तक को लिखने की आवश्यकता भाजपा नेताओं ने उस समय महसूस की थी जबकि अप्रत्याशित रूप से 2009 में मनमोहन सिंह के नेत्त्व वाली यूपीए सरकार की सत्ता में पुन: वापसी हुई थी। आज 2017 में ईवीएम की 'कारगुज़ारी' पर जश्र मनाने वाले यही भाजपाई उस समय ईवीएम की विश्वसनीयता पर संदेह कर रहे थे। लालकृष्ण अडवाणी से लेकर सुब्रमण्यम स्वामी तक कई वरिष्ठ भाजपाई नेता इवीएम की विश्वसनीयता को संदेहपूर्ण नज़रों से देखते रहे हैं। वैसे भी ईवीएम के प्रयोग को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्थिति पर नज़र डालना भी ज़रूरी है। क्या वजह है कि जर्मन जैसे प्रगतिशील देश में इसके प्रयोग को केवल इसलिए असंवैधानिक करार दे दिया गया क्योंकि मतदाता चुनाव में अपनी भागीदारी को पारदर्शी रूप से नहीं देख सकते थे? इसी प्रकार आयरलैंड में ईवीएम मशीनों को लोकतंत्र की हत्यारी बताकर इन्हें कबाड़ में फेंक दिया गया। अमेरिका में ब्रेव हैरिस द्वारा ईवीएम से होने वाले घोटाले का जैसे ही पर्दा$फाश किया गया उसी समय अमेरिका के 64 प्रतिशत राज्यों मेें ईवीएम का इस्तेमाल बंद हो गया। इस समय केवल भारत,युक्रेन,नाईज़ीरिया तथा वेनेज़ुएला जैसे $गरीब अथवा विकासशील देशों में ही इन मशीनों का प्रयोग किया जा रहा है। जबकि पाकिस्तान,नेपाल,भूटान व कंबोडिया जैसे देशों में ईवीएम के प्रयोग की योजना बन रही है। 
आज ज़रूरत इस बात की है ईवीएम के प्रयोग की वकालत करने वालों तथा इसका विरोध अथवा इसपर संदेह करने वालों को राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रविरोधी जैसे आडंबरपूर्ण चश्मे से देखने के बजाए इस नज़रिए से देखा जाना चाहिए कि आ$िखर देश की लोकतंात्रिक प्रक्रिया में भाग लेने वाले राजनैतिक दल व इससे जुड़े वरिष्ठ नेतागण ईवीएम मतदान प्रक्रिया व मतगणना पर उंगली उठाते ही क्यों हैं? क्या लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में यह ज़रूरी नहीं कि इसमें लोक विश्वास भी शामिल हो? तर्क जब कुतर्क पर उतर आए तो ऐसे जवाब दिए जा सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी जब यूपी व उत्तराखंड में धांधली करा सकती थी तो उसने पंजाब में क्यों नहीं कराया? ज़ाहिर है ऐसे तर्क देने पर भाजपाईयों को भी यह बताना पड़ेगा कि यदि ईवीएम भरोसेमंद है तो 2009 के चुनाव परिणाम के बाद उन्हें ईवीएम चुनाव प्रणाली क्यों खटकने लगी थी? उत्तरप्रदेश व उत्तराखंड के चुनाव परिणामों में ईव्ीएम द्वारा हेराफेरी की गई हो ऐसा ज़रूरी तो नहीं है परंतु यह तो ज़रूरी है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता में रह चुकी बसपा जैसी पार्टी की प्रमुख तथा इस बार भी सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए बैठी मायावती द्वारा उठाई जाने वाली आवाज़ को चुनाव आयोग द्वारा प्रत्येक पहलू से संतुष्ट किया जाए? 
पूरा विश्व जब आधुनिकीकरण की राह पर आगे बढ़ रहा हो तो निश्चित रूप से पुरानी प्रणालियां व तौर-तरीके भी पीछे छूट जाते हैं। वक्त और ज़रूरत के अनुसार भी कई रास्ते अख्तयार करने पडऩे पड़ते हैं। बैलेट पेपर व बैलेट बॉक्स को त्याग कर ईवीएम की ओर बढऩा भी एक ऐसा ही कदम है। परंतु जहां ईवीएम में कई अच्छाईयां हैं वहीं इसमें कई कमियां भी  हैं। बैलेट पेपर के विरोध में एक तर्क यह भी है कि इसमें बेइंतहा कागज़ का इस्तेमाल होता है जिसका सीधा असर जंगल में लकड़ी की कटान पर पड़ता है। परंतु बैलेट पेपर द्वारा मतदान के पक्षकार कहते हैं कि पांच वर्ष में एक बार बैलेट पेपर में जितना कागज़ इस्तेमाल होता है उससे अधिक का$गज़ एक दिन के अ$खबार प्रकाशित होने में लग जाता है। दूसरी तरफ एक बैलेट बॉक्स तो कई बार प्रयोग में लाया जा सकता है जबकि ईवीएम को प्रत्येक दस वर्ष बाद बदलना होता है। इन मशीनों को चलाने के लिए तकनीकी प्रशिक्षण की भी ज़रूरत होती है। ईवीएम द्वारा किए जाने वाले मतदान में 64 से अधिक उम्मीदवार हिस्सा नहीं ले सकते जबकि बैलेट पेपर में ऐसा नहीं है। हां ईवीएम व बैलेट पेपर के मतदान में एक मुख्य अंतर इस बात का ज़रूर है कि मतदान पत्र के प्रयोग के समय देश के विभिन्न क्षेत्रों से बूथ कैपचरिंग किए जाने की $खबरें आती रहती थीं जोकि ईवीएम का इस्तेमाल शुरु होने के बाद आनी बंद हो गईं। वैसे भी बूथ कैपचरिंग $कानून व्यवस्था तथा सुरक्षा से जुड़ा विषय था इसकी जि़म्मेदारी मतपत्र द्वारा की जाने वाली मतदान प्रणाली पर दोष के रूप में नहीं डाली जा सकती। 
भाजपा प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हराव द्वारा लिखित पुस्तक 'डेमोक्रेसी एट रिस्क' में यह संदेह व्यक्त किया गया है कि चूंकि मशीन से भी $गलतियां हो सकती हैं लिहाज़ा ईवीएम गलती नहीं कर सकती यह कहना ठीक नहीं है। इसी पुस्तक में ईवीएम से चुनाव कराने के चुनाव आयोग के फैसले,ईवीएम में होने वाली धांधली की संभावनाओं,हैकिंग की संभावना,असुरक्षित सॉफ्टवेयर व हार्डवेयर तथा ईवीएम के प्रयोग की संवैधानिक स्थिति जैसे विषयों पर तो प्रश्र उठाया ही गया है साथ-साथ चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता व चुनाव प्रक्रिया के सत्यापन को सुनिश्चित करने की आवाज़ भी उठाई गई है। निश्चित रूप से आज का सबसे बड़ा सोचने  व चिंतन करने का गंभीर विषय यही है कि बजाए इसके कि हम यह देखें कि ईवीएम के पक्ष या इसके विरोध में किसने आवाज़ उठाई। और यह सोचें कि उसने आवाज़ इसलिए उठाई क्योंकि वह चुनाव में पराजित हुआ है। आज देश की सरकार को यह सोचने की ज़रूरत है कि चुनाव आयोग के सहयोग से वह हर कीमत पर यह सुनिश्चित करे कि देश की लोकतंात्रिक चुनाव व्यवस्था में प्रत्येक मतदाता को इस मुद्दे पर शत-प्रतिशत संतुष्ट होना चाहिए कि उसने जिसके पक्ष में मतदान किया है उसका मत उसी के खाते में गया है तथा उसके साथ किसी तरह की हेराफेरी नहीं की गई है। लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में लोक विश्वास का होना जीत व हार से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है। (निर्मल रानी, प्रैसवार्ता)

गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने के लिए प्रयासरत्: संत कुमार

4:49:00 PM
sant kumar
गीता प्रचारक, बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक तथा पिछले चार दशक से वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में जिला न्यायालय फतेहाबाद में प्रैक्टिस कर रहे संत कुमार एडवोकेट गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करवाने के लिए प्रयासरत् है। कविताएं, गजलें लिखने के शौकीन साहित्यकार संत कुमार एडवोकेट ने एक नावल नूरां पर अंतर्राष्ट्रीय टीवी चैनल ने संत कुमार पर एक डॉक्यूमैंटरी का प्रसारण भी किया जा चुका है। अनके धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिज्ञों से जुडऩे वाले इस अधिवक्ता का धर्म, राजनीति व इतिहास के विषयों पर प्रभावी पकड़ है। गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करवाने के लिए कटिबद्ध संत कुमार गीता के प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न शिक्षण संस्थाओं, धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर  अपनी बात प्रभावशाली ढंग से कहते है। जीओ गीता फतेहाबाद के जिलाध्यक्ष संत कुमार कहते है कि गीता किसी धर्म  जाति समुदाय वर्ग विशेष ग्रंथ नहीं, अपितु समस्त मानव कल्याण के लिए है, जो चारों योग, पर्यावरण, प्रकृति, मानव का उद्गार और पतन के बारे में बताने के साथ साथ जीवन जीने की कला सिखाती है। इसके साथ ही सत्य अहिंसा, आत्मा-परमात्मा, न्याय नीति और मुक्ति की बात करती है। गीता प्रचारक ने यह भी कहा कि गीता की जितनी जरूरत महाकाल में थी, उससे भी कहीं ज्यादा वर्तमान में जरूरत है, क्योंकि आज विश्व में आतंकवाद, बेईमानी, भ्रष्टाचार, पुराचार चरम सीमा पकड़ चुके है और युवा वर्ग दिशाहीन हो चुके है। संत कुमार ने हरियाणा सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मौजूदा  मनोहर सरकार ने स्कूली पाठ्यक्रम में गीता को शुरू करवाकर सराहनीय काम किया है। इससे विद्यार्थियों को सही दिशा और नैतिक बल मिलेगा।(प्रैसवार्ता)

मोहब्बत की बेमिसाल कहानी दर्शाता है भागलपुर का ताजमहल

4:47:00 PM
 भागलपुर का ताजमहल
अपनी पत्नी हुस्न बानों के गम में डूबे पति डॉ. नजीर आलम ने उसकी याद को तरोताजा रखने के लिए करीब 35 लाख रुपये खर्च करके भागलपुर में एक ताजमहल बनाया है, जिसे देखने वालों की भीड़ अक्सर यहां देखी जाने लगी है। करीब 57 वर्ष पूर्व डॉ. आलम का हुस्न बानों से निकाह हुआ था। चार वर्ष बाद पति-पत्नी हज की यात्रा कर लौटे थे, तब उन्होंने फैसला लिया था कि जिसकी मृत्यु पहले होगी, उसका मकबरा घर के आगे बनेगा, जोकि उसके सपनों का ताजमहल होगा। डॉ. आलम ने इस फैसले से परिवारजनों को भी अवगत करवा दिया था। वर्ष 2015 में डॉ. आलम की पत्नी का निधन हो गया और लिए गए फैसले पर अमलीजामा पहनाते हुए डॉ. आलम ने इसकी समस्त कमाई इस यादगार पर लगा दी। डॉ. आलम का कहना है कि उसके बच्चे अपनी रोजी रोटी कमाने में सक्षम है और उन्होंने इस यादगार में आर्थिक सहयोग दिया है। करीब दो वर्ष तक चले इस निर्माण कार्य से ताजमहल तो बन गया, लेकिन डॉ. आलम की आर्थिक स्थिति गड़बड़ा गई। होम्योपैथिक चिकित्सक होने के कारण डॉ. आलम की आमदनी सीमित थी और इस पर भी उन्हें अपने दस बच्चों की शिक्षा व आत्मनिर्भरता का फिक्र था, मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। डॉ. आलम के तीन बेटों और तीन बेटियों को होम्योपैथिक चिकित्सक की पढ़ाई करके आत्मनिर्भर बनाया, जबकि दो बेटों ने अपना रोजगार शुरू किया हुआ है। सांय होते ही इस मकबरे में संगमरमर का गुंबद व मीनार रोशनी से चमक उठते है, जिन्हें देखने के लिए बधाईयों का तांता लगा हुआ है और वह इस महोब्बत की अद्भूत मिसाल की सराहना करते नहीं थकते। पत्नी हुसन बानों के निधन होने उपरांत डॉ. आलम इस मकबरा का निर्माण कार्य शुरू करवाया, जो दो वर्ष के समय में बनकर तैयार हुआ। 35 लाख से बने इस मकबरे में टाईल्स, मार्बल, ग्रेनाईट पत्थर, शीशा, स्टील, लाईटिंग का जबरदस्त काम किया है, जबकि मकबरे का गुम्मद शहजंगी के हाफिज तैयब ने तैयार किया है, वहीं उसके चार मीनार के निर्माण के लिए गुजरात के कारीगर नौशाद ने अच्छी नक्काशी की है। डॉ. आलम के अनुसार उनकी इच्छा है कि पत्नी की महोब्बत को लोगों के बीच छोड़कर जाए, ताकि हमारी महोब्बत हमेशा कायम रहे। डॉ. आलम की बेटी साबरा खातून का कहना है कि मां के निधन उपरांत पिता ने कहा था कि मेरी मौत के बाद मुझे भी मां की पड़ौस में दफन कर देना, जिसके लिए जगह सुरक्षित रखी हुई है। डॉ. आलम चाहते है कि इस यादगारी मकबरे में लड़कियों की डिजीटल ढंग से पढ़ाई शुरू की जाए, जिसके लिए वह 18 मार्च 2017 से मदरसे की शुरूआत करने जा रहे है।(प्रैसवार्ता)

शराब: प्रतिबंध ज़रूरी या शासकीय संरक्षण ?

4:46:00 PM
शराब एक ऐसा नशीला पेय पदार्थ है जिसकी संभवत: कोई भी व्यक्ति यहां तक कि इसका सेवन करने वाले लोग भी इसके गुण, लाभ या विशेषताएं बयान नहीं कर पाते। हमारे देश में ऐसे लाखों परिवार मिल जाएंगे जो शराब की वजह से बरबाद हो चुके हैं। इस नामुराद नशीले द्रव्य ने न जाने कितने घरों को तबाह कर दिया,कितने परिवारों को तोड़ दिया, इसके चलते अनगिनत हत्याएं तथा दूसरे कई गंभीर अपराध होते रहे हैं। वाहन दुर्घटनाओं में भी शराब सेवन की अहम भूमिका मानी जाती है। इन सबके अतिरिक्त व्यक्तिगत् रूप से शराब पीने वाले व्यक्ति के स्वास्थय पर इसका जो बुरा प्रभाव पड़ता है वह जगज़ाहिर है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि शराब किसी भी दृष्टिकोण से जब परिवार या समाज के लिए पूरी तरह से हानिकारक है तो निश्चित रूप से यह द्रव्य देश के विकास के लिए भी बहुत बड़ी बाधा है। आज शराब की बिक्री वाले कई राज्य ऐसे भी हैं जहां अपने अभिभावकों को शराब के नशे में हर व$क्त डूबा देखकर स्कूल जाने वाले उनके छोटे-छोटे बच्चे भी शराब की लत का शिकार हो चुके हैं। ऐसे में निश्चित रूप से एक ऐसी राष्ट्रीय नीति की दरकार है जो समाज को इस नासूर जैसी बुराई से बचाने तथा देश को विकास के रास्ते पर ले जाने हेतु बनाई जाए। ज़ाहिर है राष्ट्रीय स्तर पर इसे प्रतिबंधित करना ही भारतीय समाज को इस बुराई से दूर रखने का एकमात्र उपाय है।  हमारे देश के संविधान में राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत अनुच्छेद 47 के अनुसार राज्य नशीली दवाओं के औषधीय उद्देश्यों को छोड़कर इसके उपभोग के निषेध को लाने का प्रयास करेगा जोकि स्वास्थय के लिए हानिकारक है। इसी नीति के अंतर्गत् भारत में गुजरात, केरल, नागालैंड, मणिपुर, संघ शासित प्रदेश लक्षद्वीप तथा अब बिहार में भी शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। इसके पूर्व आंध्र प्रदेश, हरियाणा, मिज़ोरम और तमिलनाडु में भी शराब को प्रतिबंधित किया गया था परंतु बाद में यह प्रतिबंध हटा लिए गए। शराब पर ताज़ातरीन बहुचर्चित प्रतिबंध की घोषणा 26 नवंबर 2015 को बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार द्वारा की गई। हालांकि उन्होंने 1 अप्रैल 2016 से राज्य में प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी। परंतु 5 अप्रैल 2016 से पूरे राज्य में पूर्ण शराबबंदी घोषित कर दी गई। यहां तक कि राज्य के किसी भी होटल व क्लब तक में इसका सेवन नहीं किया जा सकता। इस $कानून की अवहेलना करने वालों को पांच से लेकर दस वर्ष तक का कारावास व जुर्माना हो सकता है। हालांकि 30 सिंतबर 2016 को बिहार हाईकोर्ट ने शराबबंदी के विरुद्ध अपना $फैसला सुनाते हुए शराब प्रतिबंध को अवैध,अव्यहवारिक तथा असंवैधानिक बताया था। परंतु देश के सर्वाेच्च न्यायालय ने उच्च न्यायलय के आदेश पर रोक लगा दी। बहरहाल बिहार में इस समय पूर्ण शराब बंदी स$ख्ती से लागू हो चुकी है और पूरे राज्य का जनसमर्थन नितीश कुमार को इस मुद्दे पर हासिल है। यहां तक कि 21 जनवरी 2017 को मुख्यमंत्री नितीश कुमार के आह्वान पर शराब प्रतिबंध के समर्थन में राज्य में बारह हज़ार सात सौ साठ किलोमीटर की एक ऐतिहासिक मानव श्रृंखला बनाई गई जिसमें राज्य के तीन करोड़ से अधिक लोगों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़कर शराबबंदी के समर्थन में अपनी एकजुृटता का इज़हार किया। 
सवाल यह है कि जब बिहार में लागू की गई शराबबंदी को केवल बिहार राज्य के लोगों का ही नहीं बल्कि पूरे देश का समर्थन हासिल है यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सार्वजनिक रूप से राज्य में शराबबंदी लागू करने के लिए मुख्यमंत्री नितीश कुमार की प्रशंसा कर चुके हैं ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के शासन वाले राज्य छत्तीसगढ़ में सरकार द्वारा स्वयं शराब बेचने की व्यवस्था करने का आ$िखर क्या औचित्य है? वैसे भी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा० रमन सिंह एक अध्यापक होने के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की गहन शिक्षा भी हासिल कर चुके हैं। ऐसे में कम से कम उनके मुख्यमंत्री रहते यह उम्मीद तो नहीं की जा सकती थी कि राज्य में शराब बेचने की जि़म्मेदारी राज्य सरकार स्वयं उठाएगी? परंतु इस निर्णय से यह सा$फ ज़ाहिर हो गया है कि छत्तीसगढ़ की रमन सरकार की नज़रों में राज्य का राजस्व तथा शराब का व्यापार ज़्यादा अहमियत रखता है न कि छत्तीसगढ़ के लोगों का स्वास्थय तथा उनका विकास। अन्यथा डा० रमन सिंह भी नितीश कुमार की ही तरह राज्य में शराब के प्रतिबंध के हिमायती होते, राज्य सरकार के संरक्षण में शराब की बिक्री के नहीं। बड़ी अजीब सी बात है कि मुख्यमंत्री ने इस $फैसले की तुलना नोटबंदी के $फैसले से करते हुए यह कहा कि कैबिनेट का यह निर्णय नोटबंदी की तरह कोचियाबंदी के लिए लिया गया है। उनके अनुसार गांवों की समस्या वहां की शराब की दुकानें नहीं बल्कि अवैध शराब बेचने वाले कोचिए और उनका आतंक था। सरकार शराब बेचेगी तो कोचियों और ठेकेदार के लोग अवैध शराब नहीं बेच सकेंगे। 
डा० रमनसिंह का यह तर्क सही है या हास्यास्पद इस विषय पर चिंतन करना भी ज़रूरी है। क्या अवैध शराब या न$कली शराब की बिक्री रोकने के लिए यही एक उपाय है कि सरकार स्वयं शराब बेचने लग जाए? छत्तीसगढ़ सरकार का यह निर्णय बिहार व छत्तीसगढ़ राज्य के शासकों की दूरदर्शिता का तुलनात्मक अध्ययन करने की भी प्रेरणा देता है। छत्तीसगढ़ भी $गरीबी के मामले में बिहार से कम नहीं है। यहां भी राज्य में एक बड़े नक्सल प्रभावित क्षेत्र में $गरीबी व भुखमरी जैसा माहौल है। यहां का बड़ा वनवासी क्षेत्र $गरीब व आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। इन लोगों के बारे में सरकार को इनके विकास की चिंता करनी चाहिए न कि इस बात की कि यह बेचारे न$कली शराब पीने के बजाए शुद्ध शराब पिएं और यह शुद्ध शराब इन्हें मुहैया कराने का जि़म्मा राज्य सरकार उठाए। परंतु छत्तीसगढ़ में ऐसा ही किया गया है जबकि नितीश कुमार ने एक बड़े राज्य का मुख्यमंत्री होने के बावजूद तथा इस बात का अंदाज़ा लगाने के बावजूद कि शराब बंदी की नीति से राज्य को लगभग चार हज़ार करोड़ रुपये प्रतिवर्ष का नु$कसान उठाना पड़ेगा, फिर भी नितीश कुमार ने राज्य के लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए पूर्ण शराबबंदी घोषित कर दी। 
इसमें कोई संदेह नहीं कि शराब उत्पादन से लेकर इसकी बिक्री तक में शरीक लोगों के रसू$ख केंद्र से लेकर लगभग सभी राज्य सरकारों के सत्ताधीशों तक बहुत गहरे हैं। जनता को भी इस विषय पर गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है कि देश की तरक्की व खुशहाली के लिए शराब पर प्रतिबंध आवश्यक है या शराब की बिक्री को राज्य सरकारों द्वारा संरक्षण दिया जाना? (निर्मल रानी, प्रैसवार्ता)

हरियाणवी पंचों का प्याला है हुक्का

6:37:00 PM
हरियाणा के ग्रामीण आंचल में  ग्रामीण जीवन से हुक्का का गहरा संबंध रहा है, जोकि प्राचीन काल से ही हुक्का हरियाणवी संस्कृति में अपनी गौरवमयी तथा गरिमापूर्ण इतिहास संजोये हुए है। यह कह पाना कठिन है कि हुक्का का जन्म कब, कहां और किन परिस्थितियों में हुआ, मगर पुरूषों द्वारा अपनी आस्था के रूप में हुक्का का निर्माण बड़े ही वैज्ञानिक और रहस्यपूर्ण नियमों को ध्यान में रखकर किया। यूँ तो धुम्रपान करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, मगर हुक्का को धुम्रपान सेवन का एक व्यवस्थित रूप माना जाता है। हमारे पूर्वजों ने मनुष्य जीवन की पहली सच्चाई अग्रि, हवा, पानी तथा अन्तिम सच्चाई अग्नि का समावेग कर हुक्का की सरंचना की। वर्तमान में भी ग्रामीण आँचल में आग और पानी को देवता तुल्य सम्मान प्राप्त है, जिन्हें एक ही स्थान पर पाकर हुक्का वाले को घर की समृद्धि व संपन्नता का प्रतीक माना जाता है। हुक्का की अपनी मान, मर्यादा और अपना अलग संविधान है। हुक्का पीने तथा भरने के लिए के भी अपने ही नियम और कानून है। मौजूदा स्थिति में सबसे कम उम्र वाला या मेजबान ही हुक्का भरता है तथा सबसे बड़ी उम्र वाला या मेहमान ही हुक्का का पहला कश लगाता है। मेहमान को जब तक ताजा पानी डालकर हुक्का न भर कर दिया जाए, तब तक वह अपना अपमान अनुभव करता है, अर्थात् हुक्का मान-सम्मान का प्रतीक भी है। आपसी मतभेद भुलाकर हुक्के को पीने बैठ जाना एक आम बात है। अत: हुक्का आपसी भाईचारे का प्रतीक है। किसी खुशी अथवा गमीं का आरंभ व समाप्ति हुक्का के बिना अधूरी है। हुक्का के चारो ओर बैठकर घर ग्राम की विभिन्न समस्याओं पर भी चर्चा होती है। अपराधी तथा सामाजिक संस्थाओं को तोडऩे वाले आदमी का सामाजिक बहिष्कार अर्थात् हुक्का पानी करके दिया जाता है। किसी भी सच्चाई की पुष्टि के लिए संदिग्ध व्यक्ति को हुक्का पर हाथ रखकर कसम दिलाई जाती है, जो सभी को मान्य होती है। इसलिए हुक्का को न्यायिक आस्था का रूप भी माना जाता है। पहले हुक्का मिट्टी व लकड़ी के बनाए जाते थे, मगर आधुनिकता के इस युग में ये पीतल, लोहे के रूप में भी उपलब्ध है। मिट्टी तथा लकडी के हुक्का में पानी ज्यादा देर तक ठंडा रहता है। अत: उसे बार-बार ठंडा करने की जरूरत नहीं पड़ती। हुक्का पर रखी चिलममें तंबाकू डालकर उस पर मिट्टी का एक तवा रखकर आग डाल दी जाती है। तवा गर्म होने पर तंबाकू जलने लगता है। कश लगाने पर धुंआ पानी में फिल्टर होकर दूसरी नाली से सेवनकर्ता के मुँह में आता है, जिससे धुएं में मिश्रित निकोटीन स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव नहीं डालती। हुक्का का देसी तंबाकू बड़ी मेहनत से तैयार किया जाता है। तंबाकू को पीछे से सुखाकर उसे कूटा जाता है, फिर उसमें गुड़ या गुड़ की लाट डाली जाती है, जिससे उसमें निकोटीन का प्रभाव कम हो जाता है। थोड़ा तंबाकू डालने पर ज्यादा देर चलता है, इसलिए कहा गया है कि 'घालो पूणा आवे दूणाÓ। रात्रि विश्राम और सुबह की दिनचर्या ग्रामीण आंचल में हुक्का से शुरू होकर समाप्त होती है। बेटे और बहू की योग्यता मापने का पैमाना भी हुक्का से ही समझा जाता है। (मनमोहित ग्रोवर, प्रैसवार्ता)

संतबेतरा अशोका की भविष्यवाणी हो रही है सच, दिल्ली में बनेगी भाजपा की सरकार

12:48:00 PM
नई दिल्ली(प्रैसवार्ता)। सुदर्शन चक्रज्योतिषाचार्य संतबेतरा अशोका की दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर की गई भविष्यवाणी अब सच होती नजर आ रही है, हालांकि भविष्य की गर्भ में क्या है, इसका पता तो 10 फरवरी को ही चलेगी। प्रैसवार्ता को मिली जानकारी के अनुसार सुदर्शन चक्रज्योतिषाचार्य संतबेतरा अशोका ने 11 मई 2014 को एक भविष्यवाणी की थी, जिसमें उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए 4 अंकों का चयन किया था, जोकि 6, 3, 7, 0 थे। अगर हम दिल्ली विधानसभा चुनाव पर एक नजर डाले तो पता चलेगा कि इस बार दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए 673 उम्मीदवारों ने अपना भाग्य अजमाया है, जिसमें 63 महिलाएं है और 67 प्रतिशत ही दिल्ली में मतदान हुआ है एवम् भाजपा के 67 विधायक भारी बहुमत से जीतने का दावा कर रहे है। उपरोक्त 4 अंकों के आधार पर एग्जिट पोल को मद्देनजर रखते हुए दिल्ली में भाजपा की ही सरकार बनेगी। चूंकि यह भी हो सकता है कि भाजपा को 63 की बजाए 36, आम आदमी पार्टी को 34, कांग्रेस व अन्य को 0 सीटें मिल सकती है। संतबेतरा अशोका की भविष्यवाणी के अनुसार 10 फरवरी का दिन भाजपा के   लिए जश्र का दिन हो सकता है, जबकि आम आदमी पार्टी व अन्य के लिए निराशाजनक। लेकिन भविष्य की गर्भ में क्या है, ये तो 10 फरवरी को ही पता चलेगा।

साक्षात्कार : लोक संस्कृति के मर्मज्ञ साहित्यकार ओमप्रकाश कादयान

6:43:00 PM
हरियाणवी बोली को पहला लघुकथा संग्रह देने का श्रैय साहित्यकार ओमप्रकाश कादयान के खाते में है। हरियाणा की मिटटी की सोधी खुशबू को अपने कैमरे, कलम व ब्रश के माध्यम से जन तक ले जाने का साहित्यकार ओमप्रकाश कादयान का अपना अंदाज है। झज्जर जिले के बेरी में जन्में प्रसिद्ध छायाकार, लोक संस्कृति के मर्मज्ञ ओमप्रकाश लगभग तीन दशकों से हरियाणवी लोक कला संस्कृति के संजृन में लगे हुए है। देश की शायद ही कोई स्तरीय पत्रिका या समाचार पत्र होगा, जिनमें इनकी रचनाएं ना छपी हों। उनकी 5हजार से अधिक रचनाएं, 15हजार से अधिक छायाचित्र, 3हजार से अधिक रेखाकंन, 250से अधिक पुस्तक समीक्षाएं पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी है। दर्जनों साहित्यिक पुस्तकों के कॅवर पर उनके चित्र छप चुके है। उनकी लिखी रचनाएं हिन्दी एम.ए. की कक्षाओं में पढ़ाई जा रही है। दूरदर्शन,अकाशवाणी केन्द्रों से इनकी वार्ताएं प्रसारित होती रही हैं। उनके चित्रों की प्रदर्शन विभिन्न विश्वविद्यालयों में लगाई जाती रहती है।  हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा विशेष अकादमी सम्मान से सम्मानित किया गया। प्रकाशित पुस्तकें की बात करे तो हरियाणा के लोकगीत भाग-2, हरियाणा की सांस्कृतिक धरोहर, हरियाणा की सांस्कृतिक विरासत, आन्ध्यां की लाठी(हरियाणवी का पहला लघुकथा संग्रह), कैक्टस के फूल (लघुकथा संग्रह), हम पंछी नील गगन के (बालगीत संग्रह) आदि है। भविष्य में कई अन्य योजनाओं पर उनका काम चल रहा है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी ओमप्रकाश कादयान सरल व मिलनसार स्वभाव के है। वैसे तो ओमप्रकाश कादयान कई विधाओं पर लिखते हैं, किन्तु लोक पर केन्द्रित साहित्य सृजन इनका मूल विषय है। इसी विषय पर उनके वार्ता करने का अवसर प्राप्त हुआ उसी मुलाकात के कुछ अंश - 
नवल सिंह - आपकी विधाओं में हरियाणा के गांवों की मिट्टी से उपजी दिल को छू लेनी वाली सवेदनाओं का क्या राज है?
ओमप्रकाश- हरियाणा के गांव में जन्मा, देहात की मिट्टी में खेल-कूद कर पला बड़ा हुआ, इसी मिटट्ी की गोद में बैठ कर अपनी रचनाऐं रची तो देहात की संस्कृति से, वहां की जमीन से जुड़ाव कैसे ना होता। उस महक का, उस भावना का विधाओं में उमडऩी लाजमी है। 
नवल सिंह- छायांकन (फोटोग्राफी) में गांव या शहर में कहां बेहतर महसूस करते है?
ओमप्रकाश- छायांकन का कोई वक्त नहीं, कोई स्थान नहीं पता नहीं। दृश्य को पहचाना होता है,चित्र खोजना होता है। पर चुकि गांवों हमारी जड़ें है वहां कला-संस्कृति का वास है। खेत-खलियानों व पगडण्डियों में प्रकृति का वास है जिसमें छायांकन की आत्मा बसती है। 
नवल सिंह- आपकी कथाओं में, रेखाकंन में, छायाचित्रों में व लेखन में प्रकृति का खासा असर देखा जाता है। प्रकृति से लगाव का कोई खास कारण?
ओमप्रकाश-बचपन से है, बच्चे थे तो गांव की बणी में (लघु जंगल), तालाबों पर, नहर पर, खेतों में, खूब घूमते थे। मैंने संस्कृति को जीया है प्रकृति से सीधे तौर पर साक्षात्कार किया है जिससे लगाव होना स्वाभाविक है। हर साहित्यकार का संजृन के लिए प्रकृति से संवाद होना जरूरी भी है।
नवल सिंह- चर्चा में है कि आप लोकगीतों को लेकर किसी बड़ी योजना पर काम कर रहे है इसमें बारे में कुछ बताऐंगे?
ओमप्रकाश- नवल जी, लोकगीत लुप्त होते जा रहे है इन्हें संग्रहीत करने के उददेश्य से मैने हरियाणा के गांवों की निरन्तर यात्राएं की, गांव की गलियों में, कच्चे-पक्के घरों में जाकर लेखन, छायांकन किया। जिसमें अधिकतर यात्राएं मोटरसाइकिल पर रही। लोकगीतों का बड़ा संग्रह किया। हरियाणा ग्रन्थ अकादमी ने इनमें से लोकगीतों से सम्बन्धित सामाग्री को हरियाणा के लोकगीत भाग-2 पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है। जिसे बेहद सराहा गया। इसी तरह से बिश्नोई समाज से सम्बन्धित लगभग 800 गीतों को भी मैंने जुटाया है। लोकगीतों को लेकर योजना यह है कि कम से कम दस हजार लोकगीतों को लेकर एक पुस्तक का प्रकाशन किया जाए।
नवल सिंह- आधुनिकता की आंधी में लोकगीत अन्तिम सासें ले रहे है इसे आप किस रूप में देखते है?
ओमप्रकाश कादयान- सबसे पहले तो हमें इस बात को समझना होगा कि हमारे लोकगीत उत्पादन से जुड़ी पैदायश है। जिसमें सामुहिकता का महत्व है। शादी-विवाह,जन्म-मृत्यु, खेत जोतते हुए, दूध बिलौते हुए,पनघट पर, फसल कटाई के वक्त इत्यादी समय पर गीत रचे व गाऐं जाते रहे है। गांव में कच्चे मकानों को लीप कर चित्रकारी की जाती थी। चुनर, ओढनी, पंखी के कलात्मक रूप के साथ चरख पर सूत कात कर घर-घर में कला संस्कृति को पीढी दर पीढी चलाया जा रहा था। समय बदला,परम्परा बदली पर अभी भी गांवों में गीत है जिन्हें सहेज कर आगे ले जानी की जिम्मेवारी हमें निभानी होगी। 
नवल ङ्क्षसह- कादयान जी आप क्या समझते है कैसे लोक साहित्य को बचाया जा सकता है?
ओमप्रकाश कादयान- जैसा मैंने पहले बताया सहेजना, यही इसका उपाय है हमें लोकसाहित्य जैसे गीत, लोक कथाएं, लोकगाथाएं इत्यिादी को संग्रहित करना होगा। दूसरा युवाओं में,युवतियों में लोक साहित्य के प्रति लगाव पैदा करना होगा ताकि प्रतियोगिता के युग में हम अपनी जमीन से दूर ना हो।
नवल ङ्क्षसह- हरियाणा के बारे में कहा जाता रहा है कि यहां कल्चर के नाम पर सिर्फ एग्रीकल्चर है, इसे आप ने इसे झुठला कर लोकसाहित्य को नए आयाम दिए है। पर आज आप साहित्य सृजन को किस स्थिती में देखते हैं?
ओमप्रकाश कादयान- आज स्थिति चिन्तादायक तो है पर सुखद भी कही जा सकती है। नवल जी आज हरियाणा में दर्जनों साहित्यकार हरियाणवी बोली को लेखन का माध्यम बना रहे हैं। कालजयी साहित्य रचा जा रहा हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी और हरियाणा ग्रन्थ अकादमी के प्रयास भी सराहनीय है। निरन्तर लेखन से हरियाणवी बोली का स्वरूप हरियाणवी भाषा के रूप में निखरने लगा है। इस बीच कुछ हल्का साहित्य है जिससे हरियाणवी बोली की छवि बिगड़ती है इसे छोड़ कर रचानत्मक,समद्ध साहित्य लेखन की ओर साहित्यकारों को बढऩा होगा। 
नवल सिंह- भविष्य की पौध कहे जाने वाले विश्वविद्यालयों को हरियाणवी संस्कृति या लोक साहित्य को प्रकाश में लाने में या कहे तो शोधकार्य करवाने की क्या भूमिका रही हैं? हरियाणा में इसे आप किस रूप में देखते है?
ओमप्रकाश कादयान- हरियाणा के विश्वविद्यालयों के प्रयास नाकाफी रहे है ऐसा मेरा मानना है। कारण रहा कि कई विभागों के शिक्षक प्रदेश से बाहर के रहे,इसी आधारभूत कारण में उन्होंने शोध कार्य ना के बराबर करवाएं। पर हम यहां सकारत्मक योगदान की बात करे तो डॉ.जयभगवान गोयल (कु.वि.कु.) भीम सिंह मलिक (कु.वि.कु.) डॉ पूर्णचन्द शर्मा (म.द.वि.) जैसे कुछ ही प्रोफेसर या प्राध्यापक थे जिन्होंने लोक साहित्य पर विशेष ध्यान दिया। दीर्घ उपेक्षा उपरान्त कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागध्यक्ष डॉ.लालचन्द गुप्त मंगल, प्रो.बाबूराम ने शोधकार्य करवाए, पाठ्य पुस्तकों का सम्पादन किया वह सराहनीय है। डॉ. महासिंह पूनिया ने धरोहर के माध्यम से बहूत बड़ा काम किया है। विश्वविद्यालय की पत्रिका सम्भावना को दूरदृष्टि से देखा जाना चाहिए। महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय हरियाणा अध्यन्न केन्द्र के निदेशक एवं लोक प्रशासन विभाग के प्रो.एस.एस.चाहर 2010 से लगातार जनरल ऑफ प्यूपल एण्ड सोसाइटी ऑफ हरियाणा निकालकर महत्वपूर्ण योगदान दे रहे है। हकृवि हिसार द्वारा हरियाणवी भाषा व लोक कला पर केन्द्रित एम.ए.डिप्लोमा अच्छा प्रयास है। पर ये प्रयास पहले होते तो आज और भी सार्थक परिणाम होते। 
नवल ङ्क्षसह- आपने बताया कि आज दर्जनों साहित्यकार साहित्य संस्कृति पर बेहतर लिख रहे, पाठकों को उनके बारे में बताए जो इस साधना में लगे है?
ओमप्रकाश कादयान-जैसे मैने पूर्व में कहा है कि आज साहित्यकार गुणात्मक साहित्य का संजृन कर रहे है जिसमें बात करे तो डॉ.पूर्ण चन्द शर्मा, डॉ.जयनारायण कौशिक, राजकिशन नैन, रणबीर सिंह, रामफल चहल, डॉ.श्याम सखा श्याम, डॉ.लालचन्द गुप्त मंगल, डॉ.बाबूराम, डॉ.महासिंह पूनिया, डॉ.रामनिवास मानव, भारत भूषण सांघीवाल, राजबीर देसवाल, डॉ.सन्तराम देसवाल, डॉ.विश्वबन्धु शर्मा, रोहित यादव, मदन गोपाल शास्त्री, डॉ.सुधीर शर्मा, जगबीर राठी, सत्यवीर नाहडिय़ा, हलचल हरियाणवी, मास्टर महेन्द्र, आलोक भाण्डोरिया, सुरेश जांगिड़, हरिकृष्ण द्विवेदी, डॉ.सुमन कादयान, डॉ.लक्ष्मण सिंह, रामफल खटकड़, रामधारी खटकड़, शमीम शर्मा, रामफल गौड़, डॉ.सुभाष, रामकुमार आत्रेय, डॉ.सावित्री वशिष्ठ, डॉ.राजबीर धनखड़, सुमेर चन्द, भगवान सिंह अहलावत, नरेन्द्र अत्री आदि लोकसंस्कृति लेखक, कवि अपने स्तर पर प्रयासरत हैं। 
नवल सिंह- नवोदित साहित्यकारों को,पाठकों को क्या सन्देश देना चाहते है?
ओमप्रकाश कादयान- हमारे आस-पास एक जीवन है कला-संस्कृति का जिसे हम पहचान कर जीने लगे तो तमाम तरह के तनाव से हमें मुक्ति मिल जाऐगी पर हम जंगल के मृग की भांति  कस्तुरी लिए संगुन्ध की तलाश में भटकते रहते है। नवोदित साहित्यकारों को चाहिए की हल्के,अश£ील जैसे जल्द प्रसिद्धी के लेखक को छोड़कर कर कालजयी साहित्य को रचे यह मुश्किल जरूर है पर यही है जिससे चिरकाल तक उनका नाम साहित्य की दूनियां को प्रकाशित करता रहेगा। पाठक, पं्रशसकों से भी अनुरोध है कि वो किसी भी साहित्यिक विद्या पर अपनी प्रतिक्रिया से साहित्यकार को कलाकार को अवश्य परिचित करवाए जिससे उन्हें भी उम्दा संजृन में मदद मिले। (नवल सिंह, प्रैसवार्ता)

 
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