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हरियाणवी पंचों का प्याला है हुक्का

हरियाणा के ग्रामीण आंचल में  ग्रामीण जीवन से हुक्का का गहरा संबंध रहा है, जोकि प्राचीन काल से ही हुक्का हरियाणवी संस्कृति में अपनी गौरवमयी तथा गरिमापूर्ण इतिहास संजोये हुए है। यह कह पाना कठिन है कि हुक्का का जन्म कब, कहां और किन परिस्थितियों में हुआ, मगर पुरूषों द्वारा अपनी आस्था के रूप में हुक्का का निर्माण बड़े ही वैज्ञानिक और रहस्यपूर्ण नियमों को ध्यान में रखकर किया। यूँ तो धुम्रपान करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, मगर हुक्का को धुम्रपान सेवन का एक व्यवस्थित रूप माना जाता है। हमारे पूर्वजों ने मनुष्य जीवन की पहली सच्चाई अग्रि, हवा, पानी तथा अन्तिम सच्चाई अग्नि का समावेग कर हुक्का की सरंचना की। वर्तमान में भी ग्रामीण आँचल में आग और पानी को देवता तुल्य सम्मान प्राप्त है, जिन्हें एक ही स्थान पर पाकर हुक्का वाले को घर की समृद्धि व संपन्नता का प्रतीक माना जाता है। हुक्का की अपनी मान, मर्यादा और अपना अलग संविधान है। हुक्का पीने तथा भरने के लिए के भी अपने ही नियम और कानून है। मौजूदा स्थिति में सबसे कम उम्र वाला या मेजबान ही हुक्का भरता है तथा सबसे बड़ी उम्र वाला या मेहमान ही हुक्का का पहला कश लगाता है। मेहमान को जब तक ताजा पानी डालकर हुक्का न भर कर दिया जाए, तब तक वह अपना अपमान अनुभव करता है, अर्थात् हुक्का मान-सम्मान का प्रतीक भी है। आपसी मतभेद भुलाकर हुक्के को पीने बैठ जाना एक आम बात है। अत: हुक्का आपसी भाईचारे का प्रतीक है। किसी खुशी अथवा गमीं का आरंभ व समाप्ति हुक्का के बिना अधूरी है। हुक्का के चारो ओर बैठकर घर ग्राम की विभिन्न समस्याओं पर भी चर्चा होती है। अपराधी तथा सामाजिक संस्थाओं को तोडऩे वाले आदमी का सामाजिक बहिष्कार अर्थात् हुक्का पानी करके दिया जाता है। किसी भी सच्चाई की पुष्टि के लिए संदिग्ध व्यक्ति को हुक्का पर हाथ रखकर कसम दिलाई जाती है, जो सभी को मान्य होती है। इसलिए हुक्का को न्यायिक आस्था का रूप भी माना जाता है। पहले हुक्का मिट्टी व लकड़ी के बनाए जाते थे, मगर आधुनिकता के इस युग में ये पीतल, लोहे के रूप में भी उपलब्ध है। मिट्टी तथा लकडी के हुक्का में पानी ज्यादा देर तक ठंडा रहता है। अत: उसे बार-बार ठंडा करने की जरूरत नहीं पड़ती। हुक्का पर रखी चिलममें तंबाकू डालकर उस पर मिट्टी का एक तवा रखकर आग डाल दी जाती है। तवा गर्म होने पर तंबाकू जलने लगता है। कश लगाने पर धुंआ पानी में फिल्टर होकर दूसरी नाली से सेवनकर्ता के मुँह में आता है, जिससे धुएं में मिश्रित निकोटीन स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव नहीं डालती। हुक्का का देसी तंबाकू बड़ी मेहनत से तैयार किया जाता है। तंबाकू को पीछे से सुखाकर उसे कूटा जाता है, फिर उसमें गुड़ या गुड़ की लाट डाली जाती है, जिससे उसमें निकोटीन का प्रभाव कम हो जाता है। थोड़ा तंबाकू डालने पर ज्यादा देर चलता है, इसलिए कहा गया है कि 'घालो पूणा आवे दूणाÓ। रात्रि विश्राम और सुबह की दिनचर्या ग्रामीण आंचल में हुक्का से शुरू होकर समाप्त होती है। बेटे और बहू की योग्यता मापने का पैमाना भी हुक्का से ही समझा जाता है। (मनमोहित ग्रोवर, प्रैसवार्ता)

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