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लोकतांत्रिक चुनाव व्यवस्था पर 'लोक विश्वास' सबसे ज़रूरी

6:22:00 PM
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photo by internet
यह एक कड़वा सच है कि हमारे देश के सत्ताधीश आसानी से सत्ता से अलग नहीं होना चाहते। यही वजह है कि जब चुनाव में उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ता है तो वे अपनी हार की नाना प्रकार की दलीलें पेश करने लगते हैं। ऐसा ही एक सबसे आसान बहाना या दलील यह भी है कि चुनाव में बेईमानी की गई या चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी अथवा वोटिंग मशीन के माध्यम से घोटाला किया गया आदि। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद भी ऐसी ही आवाज़ बुलंद की गई। इस बार ईवीएम अर्थात् इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में धांधली का आरोप लगाने वाली सबसे मुखरित आवाज़ उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व बहुजन समाज पार्टी प्रमुख सुश्री मायावती की थी। इसके पश्चात उत्तराखंड में अपनी हार का मुंह देखने वाले हरीश रावत ने तथा पंजाब में प्रत्याशित सफलता प्राप्त न कर पाने वाले आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने भी मायावती के सुर से अपना सुर मिलाते हुए ईवीएम की विश्वसनीयता पर उंगली उठाई। सीधेतौर पर यह कहा जा सकता है कि चूंकि इन तीनों ही नेताओं की पार्टियों ने अपने-अपने राज्यों में पराजय का मुंह देखा इसलिए इन्हें ईवीएम द्वारा की गई मतदान प्रक्रिया अविश्वसनीय नज़र आ रही है। परंतु उक्त नेताओं द्वारा उठाई जाने वाली यह आवाज़ कोई पहली अथवा नई आवाज़ नहीं है। 
सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के कई वरिष्ठ नेता भी इसके पूर्व ईवीएम को अविश्वसनीय व संदिग्ध बताते हुए इस प्रणाली का विरोध कर चुके हैं। भाजपा प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हाराव तो ईवीएम की विश्वसनीयता पर प्रश्र उठाते हुए एक पुस्तक तक लिख चुके हैं।  2010 में प्रकाशित हुई 'डेमोक्रेसी एट रिस्क' नामक इस पुस्तक की प्रस्तावना लाल कृष्ण अडवाणी द्वारा लिखी गई है। इस पुस्तक को लिखने की आवश्यकता भाजपा नेताओं ने उस समय महसूस की थी जबकि अप्रत्याशित रूप से 2009 में मनमोहन सिंह के नेत्त्व वाली यूपीए सरकार की सत्ता में पुन: वापसी हुई थी। आज 2017 में ईवीएम की 'कारगुज़ारी' पर जश्र मनाने वाले यही भाजपाई उस समय ईवीएम की विश्वसनीयता पर संदेह कर रहे थे। लालकृष्ण अडवाणी से लेकर सुब्रमण्यम स्वामी तक कई वरिष्ठ भाजपाई नेता इवीएम की विश्वसनीयता को संदेहपूर्ण नज़रों से देखते रहे हैं। वैसे भी ईवीएम के प्रयोग को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्थिति पर नज़र डालना भी ज़रूरी है। क्या वजह है कि जर्मन जैसे प्रगतिशील देश में इसके प्रयोग को केवल इसलिए असंवैधानिक करार दे दिया गया क्योंकि मतदाता चुनाव में अपनी भागीदारी को पारदर्शी रूप से नहीं देख सकते थे? इसी प्रकार आयरलैंड में ईवीएम मशीनों को लोकतंत्र की हत्यारी बताकर इन्हें कबाड़ में फेंक दिया गया। अमेरिका में ब्रेव हैरिस द्वारा ईवीएम से होने वाले घोटाले का जैसे ही पर्दा$फाश किया गया उसी समय अमेरिका के 64 प्रतिशत राज्यों मेें ईवीएम का इस्तेमाल बंद हो गया। इस समय केवल भारत,युक्रेन,नाईज़ीरिया तथा वेनेज़ुएला जैसे $गरीब अथवा विकासशील देशों में ही इन मशीनों का प्रयोग किया जा रहा है। जबकि पाकिस्तान,नेपाल,भूटान व कंबोडिया जैसे देशों में ईवीएम के प्रयोग की योजना बन रही है। 
आज ज़रूरत इस बात की है ईवीएम के प्रयोग की वकालत करने वालों तथा इसका विरोध अथवा इसपर संदेह करने वालों को राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रविरोधी जैसे आडंबरपूर्ण चश्मे से देखने के बजाए इस नज़रिए से देखा जाना चाहिए कि आ$िखर देश की लोकतंात्रिक प्रक्रिया में भाग लेने वाले राजनैतिक दल व इससे जुड़े वरिष्ठ नेतागण ईवीएम मतदान प्रक्रिया व मतगणना पर उंगली उठाते ही क्यों हैं? क्या लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में यह ज़रूरी नहीं कि इसमें लोक विश्वास भी शामिल हो? तर्क जब कुतर्क पर उतर आए तो ऐसे जवाब दिए जा सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी जब यूपी व उत्तराखंड में धांधली करा सकती थी तो उसने पंजाब में क्यों नहीं कराया? ज़ाहिर है ऐसे तर्क देने पर भाजपाईयों को भी यह बताना पड़ेगा कि यदि ईवीएम भरोसेमंद है तो 2009 के चुनाव परिणाम के बाद उन्हें ईवीएम चुनाव प्रणाली क्यों खटकने लगी थी? उत्तरप्रदेश व उत्तराखंड के चुनाव परिणामों में ईव्ीएम द्वारा हेराफेरी की गई हो ऐसा ज़रूरी तो नहीं है परंतु यह तो ज़रूरी है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता में रह चुकी बसपा जैसी पार्टी की प्रमुख तथा इस बार भी सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए बैठी मायावती द्वारा उठाई जाने वाली आवाज़ को चुनाव आयोग द्वारा प्रत्येक पहलू से संतुष्ट किया जाए? 
पूरा विश्व जब आधुनिकीकरण की राह पर आगे बढ़ रहा हो तो निश्चित रूप से पुरानी प्रणालियां व तौर-तरीके भी पीछे छूट जाते हैं। वक्त और ज़रूरत के अनुसार भी कई रास्ते अख्तयार करने पडऩे पड़ते हैं। बैलेट पेपर व बैलेट बॉक्स को त्याग कर ईवीएम की ओर बढऩा भी एक ऐसा ही कदम है। परंतु जहां ईवीएम में कई अच्छाईयां हैं वहीं इसमें कई कमियां भी  हैं। बैलेट पेपर के विरोध में एक तर्क यह भी है कि इसमें बेइंतहा कागज़ का इस्तेमाल होता है जिसका सीधा असर जंगल में लकड़ी की कटान पर पड़ता है। परंतु बैलेट पेपर द्वारा मतदान के पक्षकार कहते हैं कि पांच वर्ष में एक बार बैलेट पेपर में जितना कागज़ इस्तेमाल होता है उससे अधिक का$गज़ एक दिन के अ$खबार प्रकाशित होने में लग जाता है। दूसरी तरफ एक बैलेट बॉक्स तो कई बार प्रयोग में लाया जा सकता है जबकि ईवीएम को प्रत्येक दस वर्ष बाद बदलना होता है। इन मशीनों को चलाने के लिए तकनीकी प्रशिक्षण की भी ज़रूरत होती है। ईवीएम द्वारा किए जाने वाले मतदान में 64 से अधिक उम्मीदवार हिस्सा नहीं ले सकते जबकि बैलेट पेपर में ऐसा नहीं है। हां ईवीएम व बैलेट पेपर के मतदान में एक मुख्य अंतर इस बात का ज़रूर है कि मतदान पत्र के प्रयोग के समय देश के विभिन्न क्षेत्रों से बूथ कैपचरिंग किए जाने की $खबरें आती रहती थीं जोकि ईवीएम का इस्तेमाल शुरु होने के बाद आनी बंद हो गईं। वैसे भी बूथ कैपचरिंग $कानून व्यवस्था तथा सुरक्षा से जुड़ा विषय था इसकी जि़म्मेदारी मतपत्र द्वारा की जाने वाली मतदान प्रणाली पर दोष के रूप में नहीं डाली जा सकती। 
भाजपा प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हराव द्वारा लिखित पुस्तक 'डेमोक्रेसी एट रिस्क' में यह संदेह व्यक्त किया गया है कि चूंकि मशीन से भी $गलतियां हो सकती हैं लिहाज़ा ईवीएम गलती नहीं कर सकती यह कहना ठीक नहीं है। इसी पुस्तक में ईवीएम से चुनाव कराने के चुनाव आयोग के फैसले,ईवीएम में होने वाली धांधली की संभावनाओं,हैकिंग की संभावना,असुरक्षित सॉफ्टवेयर व हार्डवेयर तथा ईवीएम के प्रयोग की संवैधानिक स्थिति जैसे विषयों पर तो प्रश्र उठाया ही गया है साथ-साथ चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता व चुनाव प्रक्रिया के सत्यापन को सुनिश्चित करने की आवाज़ भी उठाई गई है। निश्चित रूप से आज का सबसे बड़ा सोचने  व चिंतन करने का गंभीर विषय यही है कि बजाए इसके कि हम यह देखें कि ईवीएम के पक्ष या इसके विरोध में किसने आवाज़ उठाई। और यह सोचें कि उसने आवाज़ इसलिए उठाई क्योंकि वह चुनाव में पराजित हुआ है। आज देश की सरकार को यह सोचने की ज़रूरत है कि चुनाव आयोग के सहयोग से वह हर कीमत पर यह सुनिश्चित करे कि देश की लोकतंात्रिक चुनाव व्यवस्था में प्रत्येक मतदाता को इस मुद्दे पर शत-प्रतिशत संतुष्ट होना चाहिए कि उसने जिसके पक्ष में मतदान किया है उसका मत उसी के खाते में गया है तथा उसके साथ किसी तरह की हेराफेरी नहीं की गई है। लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में लोक विश्वास का होना जीत व हार से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है। (निर्मल रानी, प्रैसवार्ता)

गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने के लिए प्रयासरत्: संत कुमार

4:49:00 PM
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sant kumar
गीता प्रचारक, बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक तथा पिछले चार दशक से वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में जिला न्यायालय फतेहाबाद में प्रैक्टिस कर रहे संत कुमार एडवोकेट गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करवाने के लिए प्रयासरत् है। कविताएं, गजलें लिखने के शौकीन साहित्यकार संत कुमार एडवोकेट ने एक नावल नूरां पर अंतर्राष्ट्रीय टीवी चैनल ने संत कुमार पर एक डॉक्यूमैंटरी का प्रसारण भी किया जा चुका है। अनके धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिज्ञों से जुडऩे वाले इस अधिवक्ता का धर्म, राजनीति व इतिहास के विषयों पर प्रभावी पकड़ है। गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करवाने के लिए कटिबद्ध संत कुमार गीता के प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न शिक्षण संस्थाओं, धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर  अपनी बात प्रभावशाली ढंग से कहते है। जीओ गीता फतेहाबाद के जिलाध्यक्ष संत कुमार कहते है कि गीता किसी धर्म  जाति समुदाय वर्ग विशेष ग्रंथ नहीं, अपितु समस्त मानव कल्याण के लिए है, जो चारों योग, पर्यावरण, प्रकृति, मानव का उद्गार और पतन के बारे में बताने के साथ साथ जीवन जीने की कला सिखाती है। इसके साथ ही सत्य अहिंसा, आत्मा-परमात्मा, न्याय नीति और मुक्ति की बात करती है। गीता प्रचारक ने यह भी कहा कि गीता की जितनी जरूरत महाकाल में थी, उससे भी कहीं ज्यादा वर्तमान में जरूरत है, क्योंकि आज विश्व में आतंकवाद, बेईमानी, भ्रष्टाचार, पुराचार चरम सीमा पकड़ चुके है और युवा वर्ग दिशाहीन हो चुके है। संत कुमार ने हरियाणा सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मौजूदा  मनोहर सरकार ने स्कूली पाठ्यक्रम में गीता को शुरू करवाकर सराहनीय काम किया है। इससे विद्यार्थियों को सही दिशा और नैतिक बल मिलेगा।(प्रैसवार्ता)

मोहब्बत की बेमिसाल कहानी दर्शाता है भागलपुर का ताजमहल

4:47:00 PM
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 भागलपुर का ताजमहल
अपनी पत्नी हुस्न बानों के गम में डूबे पति डॉ. नजीर आलम ने उसकी याद को तरोताजा रखने के लिए करीब 35 लाख रुपये खर्च करके भागलपुर में एक ताजमहल बनाया है, जिसे देखने वालों की भीड़ अक्सर यहां देखी जाने लगी है। करीब 57 वर्ष पूर्व डॉ. आलम का हुस्न बानों से निकाह हुआ था। चार वर्ष बाद पति-पत्नी हज की यात्रा कर लौटे थे, तब उन्होंने फैसला लिया था कि जिसकी मृत्यु पहले होगी, उसका मकबरा घर के आगे बनेगा, जोकि उसके सपनों का ताजमहल होगा। डॉ. आलम ने इस फैसले से परिवारजनों को भी अवगत करवा दिया था। वर्ष 2015 में डॉ. आलम की पत्नी का निधन हो गया और लिए गए फैसले पर अमलीजामा पहनाते हुए डॉ. आलम ने इसकी समस्त कमाई इस यादगार पर लगा दी। डॉ. आलम का कहना है कि उसके बच्चे अपनी रोजी रोटी कमाने में सक्षम है और उन्होंने इस यादगार में आर्थिक सहयोग दिया है। करीब दो वर्ष तक चले इस निर्माण कार्य से ताजमहल तो बन गया, लेकिन डॉ. आलम की आर्थिक स्थिति गड़बड़ा गई। होम्योपैथिक चिकित्सक होने के कारण डॉ. आलम की आमदनी सीमित थी और इस पर भी उन्हें अपने दस बच्चों की शिक्षा व आत्मनिर्भरता का फिक्र था, मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। डॉ. आलम के तीन बेटों और तीन बेटियों को होम्योपैथिक चिकित्सक की पढ़ाई करके आत्मनिर्भर बनाया, जबकि दो बेटों ने अपना रोजगार शुरू किया हुआ है। सांय होते ही इस मकबरे में संगमरमर का गुंबद व मीनार रोशनी से चमक उठते है, जिन्हें देखने के लिए बधाईयों का तांता लगा हुआ है और वह इस महोब्बत की अद्भूत मिसाल की सराहना करते नहीं थकते। पत्नी हुसन बानों के निधन होने उपरांत डॉ. आलम इस मकबरा का निर्माण कार्य शुरू करवाया, जो दो वर्ष के समय में बनकर तैयार हुआ। 35 लाख से बने इस मकबरे में टाईल्स, मार्बल, ग्रेनाईट पत्थर, शीशा, स्टील, लाईटिंग का जबरदस्त काम किया है, जबकि मकबरे का गुम्मद शहजंगी के हाफिज तैयब ने तैयार किया है, वहीं उसके चार मीनार के निर्माण के लिए गुजरात के कारीगर नौशाद ने अच्छी नक्काशी की है। डॉ. आलम के अनुसार उनकी इच्छा है कि पत्नी की महोब्बत को लोगों के बीच छोड़कर जाए, ताकि हमारी महोब्बत हमेशा कायम रहे। डॉ. आलम की बेटी साबरा खातून का कहना है कि मां के निधन उपरांत पिता ने कहा था कि मेरी मौत के बाद मुझे भी मां की पड़ौस में दफन कर देना, जिसके लिए जगह सुरक्षित रखी हुई है। डॉ. आलम चाहते है कि इस यादगारी मकबरे में लड़कियों की डिजीटल ढंग से पढ़ाई शुरू की जाए, जिसके लिए वह 18 मार्च 2017 से मदरसे की शुरूआत करने जा रहे है।(प्रैसवार्ता)

शराब: प्रतिबंध ज़रूरी या शासकीय संरक्षण ?

4:46:00 PM
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शराब एक ऐसा नशीला पेय पदार्थ है जिसकी संभवत: कोई भी व्यक्ति यहां तक कि इसका सेवन करने वाले लोग भी इसके गुण, लाभ या विशेषताएं बयान नहीं कर पाते। हमारे देश में ऐसे लाखों परिवार मिल जाएंगे जो शराब की वजह से बरबाद हो चुके हैं। इस नामुराद नशीले द्रव्य ने न जाने कितने घरों को तबाह कर दिया,कितने परिवारों को तोड़ दिया, इसके चलते अनगिनत हत्याएं तथा दूसरे कई गंभीर अपराध होते रहे हैं। वाहन दुर्घटनाओं में भी शराब सेवन की अहम भूमिका मानी जाती है। इन सबके अतिरिक्त व्यक्तिगत् रूप से शराब पीने वाले व्यक्ति के स्वास्थय पर इसका जो बुरा प्रभाव पड़ता है वह जगज़ाहिर है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि शराब किसी भी दृष्टिकोण से जब परिवार या समाज के लिए पूरी तरह से हानिकारक है तो निश्चित रूप से यह द्रव्य देश के विकास के लिए भी बहुत बड़ी बाधा है। आज शराब की बिक्री वाले कई राज्य ऐसे भी हैं जहां अपने अभिभावकों को शराब के नशे में हर व$क्त डूबा देखकर स्कूल जाने वाले उनके छोटे-छोटे बच्चे भी शराब की लत का शिकार हो चुके हैं। ऐसे में निश्चित रूप से एक ऐसी राष्ट्रीय नीति की दरकार है जो समाज को इस नासूर जैसी बुराई से बचाने तथा देश को विकास के रास्ते पर ले जाने हेतु बनाई जाए। ज़ाहिर है राष्ट्रीय स्तर पर इसे प्रतिबंधित करना ही भारतीय समाज को इस बुराई से दूर रखने का एकमात्र उपाय है।  हमारे देश के संविधान में राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत अनुच्छेद 47 के अनुसार राज्य नशीली दवाओं के औषधीय उद्देश्यों को छोड़कर इसके उपभोग के निषेध को लाने का प्रयास करेगा जोकि स्वास्थय के लिए हानिकारक है। इसी नीति के अंतर्गत् भारत में गुजरात, केरल, नागालैंड, मणिपुर, संघ शासित प्रदेश लक्षद्वीप तथा अब बिहार में भी शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। इसके पूर्व आंध्र प्रदेश, हरियाणा, मिज़ोरम और तमिलनाडु में भी शराब को प्रतिबंधित किया गया था परंतु बाद में यह प्रतिबंध हटा लिए गए। शराब पर ताज़ातरीन बहुचर्चित प्रतिबंध की घोषणा 26 नवंबर 2015 को बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार द्वारा की गई। हालांकि उन्होंने 1 अप्रैल 2016 से राज्य में प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी। परंतु 5 अप्रैल 2016 से पूरे राज्य में पूर्ण शराबबंदी घोषित कर दी गई। यहां तक कि राज्य के किसी भी होटल व क्लब तक में इसका सेवन नहीं किया जा सकता। इस $कानून की अवहेलना करने वालों को पांच से लेकर दस वर्ष तक का कारावास व जुर्माना हो सकता है। हालांकि 30 सिंतबर 2016 को बिहार हाईकोर्ट ने शराबबंदी के विरुद्ध अपना $फैसला सुनाते हुए शराब प्रतिबंध को अवैध,अव्यहवारिक तथा असंवैधानिक बताया था। परंतु देश के सर्वाेच्च न्यायालय ने उच्च न्यायलय के आदेश पर रोक लगा दी। बहरहाल बिहार में इस समय पूर्ण शराब बंदी स$ख्ती से लागू हो चुकी है और पूरे राज्य का जनसमर्थन नितीश कुमार को इस मुद्दे पर हासिल है। यहां तक कि 21 जनवरी 2017 को मुख्यमंत्री नितीश कुमार के आह्वान पर शराब प्रतिबंध के समर्थन में राज्य में बारह हज़ार सात सौ साठ किलोमीटर की एक ऐतिहासिक मानव श्रृंखला बनाई गई जिसमें राज्य के तीन करोड़ से अधिक लोगों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़कर शराबबंदी के समर्थन में अपनी एकजुृटता का इज़हार किया। 
सवाल यह है कि जब बिहार में लागू की गई शराबबंदी को केवल बिहार राज्य के लोगों का ही नहीं बल्कि पूरे देश का समर्थन हासिल है यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सार्वजनिक रूप से राज्य में शराबबंदी लागू करने के लिए मुख्यमंत्री नितीश कुमार की प्रशंसा कर चुके हैं ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के शासन वाले राज्य छत्तीसगढ़ में सरकार द्वारा स्वयं शराब बेचने की व्यवस्था करने का आ$िखर क्या औचित्य है? वैसे भी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा० रमन सिंह एक अध्यापक होने के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की गहन शिक्षा भी हासिल कर चुके हैं। ऐसे में कम से कम उनके मुख्यमंत्री रहते यह उम्मीद तो नहीं की जा सकती थी कि राज्य में शराब बेचने की जि़म्मेदारी राज्य सरकार स्वयं उठाएगी? परंतु इस निर्णय से यह सा$फ ज़ाहिर हो गया है कि छत्तीसगढ़ की रमन सरकार की नज़रों में राज्य का राजस्व तथा शराब का व्यापार ज़्यादा अहमियत रखता है न कि छत्तीसगढ़ के लोगों का स्वास्थय तथा उनका विकास। अन्यथा डा० रमन सिंह भी नितीश कुमार की ही तरह राज्य में शराब के प्रतिबंध के हिमायती होते, राज्य सरकार के संरक्षण में शराब की बिक्री के नहीं। बड़ी अजीब सी बात है कि मुख्यमंत्री ने इस $फैसले की तुलना नोटबंदी के $फैसले से करते हुए यह कहा कि कैबिनेट का यह निर्णय नोटबंदी की तरह कोचियाबंदी के लिए लिया गया है। उनके अनुसार गांवों की समस्या वहां की शराब की दुकानें नहीं बल्कि अवैध शराब बेचने वाले कोचिए और उनका आतंक था। सरकार शराब बेचेगी तो कोचियों और ठेकेदार के लोग अवैध शराब नहीं बेच सकेंगे। 
डा० रमनसिंह का यह तर्क सही है या हास्यास्पद इस विषय पर चिंतन करना भी ज़रूरी है। क्या अवैध शराब या न$कली शराब की बिक्री रोकने के लिए यही एक उपाय है कि सरकार स्वयं शराब बेचने लग जाए? छत्तीसगढ़ सरकार का यह निर्णय बिहार व छत्तीसगढ़ राज्य के शासकों की दूरदर्शिता का तुलनात्मक अध्ययन करने की भी प्रेरणा देता है। छत्तीसगढ़ भी $गरीबी के मामले में बिहार से कम नहीं है। यहां भी राज्य में एक बड़े नक्सल प्रभावित क्षेत्र में $गरीबी व भुखमरी जैसा माहौल है। यहां का बड़ा वनवासी क्षेत्र $गरीब व आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। इन लोगों के बारे में सरकार को इनके विकास की चिंता करनी चाहिए न कि इस बात की कि यह बेचारे न$कली शराब पीने के बजाए शुद्ध शराब पिएं और यह शुद्ध शराब इन्हें मुहैया कराने का जि़म्मा राज्य सरकार उठाए। परंतु छत्तीसगढ़ में ऐसा ही किया गया है जबकि नितीश कुमार ने एक बड़े राज्य का मुख्यमंत्री होने के बावजूद तथा इस बात का अंदाज़ा लगाने के बावजूद कि शराब बंदी की नीति से राज्य को लगभग चार हज़ार करोड़ रुपये प्रतिवर्ष का नु$कसान उठाना पड़ेगा, फिर भी नितीश कुमार ने राज्य के लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए पूर्ण शराबबंदी घोषित कर दी। 
इसमें कोई संदेह नहीं कि शराब उत्पादन से लेकर इसकी बिक्री तक में शरीक लोगों के रसू$ख केंद्र से लेकर लगभग सभी राज्य सरकारों के सत्ताधीशों तक बहुत गहरे हैं। जनता को भी इस विषय पर गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है कि देश की तरक्की व खुशहाली के लिए शराब पर प्रतिबंध आवश्यक है या शराब की बिक्री को राज्य सरकारों द्वारा संरक्षण दिया जाना? (निर्मल रानी, प्रैसवार्ता)

हरियाणवी पंचों का प्याला है हुक्का

6:37:00 PM
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हरियाणा के ग्रामीण आंचल में  ग्रामीण जीवन से हुक्का का गहरा संबंध रहा है, जोकि प्राचीन काल से ही हुक्का हरियाणवी संस्कृति में अपनी गौरवमयी तथा गरिमापूर्ण इतिहास संजोये हुए है। यह कह पाना कठिन है कि हुक्का का जन्म कब, कहां और किन परिस्थितियों में हुआ, मगर पुरूषों द्वारा अपनी आस्था के रूप में हुक्का का निर्माण बड़े ही वैज्ञानिक और रहस्यपूर्ण नियमों को ध्यान में रखकर किया। यूँ तो धुम्रपान करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, मगर हुक्का को धुम्रपान सेवन का एक व्यवस्थित रूप माना जाता है। हमारे पूर्वजों ने मनुष्य जीवन की पहली सच्चाई अग्रि, हवा, पानी तथा अन्तिम सच्चाई अग्नि का समावेग कर हुक्का की सरंचना की। वर्तमान में भी ग्रामीण आँचल में आग और पानी को देवता तुल्य सम्मान प्राप्त है, जिन्हें एक ही स्थान पर पाकर हुक्का वाले को घर की समृद्धि व संपन्नता का प्रतीक माना जाता है। हुक्का की अपनी मान, मर्यादा और अपना अलग संविधान है। हुक्का पीने तथा भरने के लिए के भी अपने ही नियम और कानून है। मौजूदा स्थिति में सबसे कम उम्र वाला या मेजबान ही हुक्का भरता है तथा सबसे बड़ी उम्र वाला या मेहमान ही हुक्का का पहला कश लगाता है। मेहमान को जब तक ताजा पानी डालकर हुक्का न भर कर दिया जाए, तब तक वह अपना अपमान अनुभव करता है, अर्थात् हुक्का मान-सम्मान का प्रतीक भी है। आपसी मतभेद भुलाकर हुक्के को पीने बैठ जाना एक आम बात है। अत: हुक्का आपसी भाईचारे का प्रतीक है। किसी खुशी अथवा गमीं का आरंभ व समाप्ति हुक्का के बिना अधूरी है। हुक्का के चारो ओर बैठकर घर ग्राम की विभिन्न समस्याओं पर भी चर्चा होती है। अपराधी तथा सामाजिक संस्थाओं को तोडऩे वाले आदमी का सामाजिक बहिष्कार अर्थात् हुक्का पानी करके दिया जाता है। किसी भी सच्चाई की पुष्टि के लिए संदिग्ध व्यक्ति को हुक्का पर हाथ रखकर कसम दिलाई जाती है, जो सभी को मान्य होती है। इसलिए हुक्का को न्यायिक आस्था का रूप भी माना जाता है। पहले हुक्का मिट्टी व लकड़ी के बनाए जाते थे, मगर आधुनिकता के इस युग में ये पीतल, लोहे के रूप में भी उपलब्ध है। मिट्टी तथा लकडी के हुक्का में पानी ज्यादा देर तक ठंडा रहता है। अत: उसे बार-बार ठंडा करने की जरूरत नहीं पड़ती। हुक्का पर रखी चिलममें तंबाकू डालकर उस पर मिट्टी का एक तवा रखकर आग डाल दी जाती है। तवा गर्म होने पर तंबाकू जलने लगता है। कश लगाने पर धुंआ पानी में फिल्टर होकर दूसरी नाली से सेवनकर्ता के मुँह में आता है, जिससे धुएं में मिश्रित निकोटीन स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव नहीं डालती। हुक्का का देसी तंबाकू बड़ी मेहनत से तैयार किया जाता है। तंबाकू को पीछे से सुखाकर उसे कूटा जाता है, फिर उसमें गुड़ या गुड़ की लाट डाली जाती है, जिससे उसमें निकोटीन का प्रभाव कम हो जाता है। थोड़ा तंबाकू डालने पर ज्यादा देर चलता है, इसलिए कहा गया है कि 'घालो पूणा आवे दूणाÓ। रात्रि विश्राम और सुबह की दिनचर्या ग्रामीण आंचल में हुक्का से शुरू होकर समाप्त होती है। बेटे और बहू की योग्यता मापने का पैमाना भी हुक्का से ही समझा जाता है। (मनमोहित ग्रोवर, प्रैसवार्ता)

संतबेतरा अशोका की भविष्यवाणी हो रही है सच, दिल्ली में बनेगी भाजपा की सरकार

12:48:00 PM
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नई दिल्ली(प्रैसवार्ता)। सुदर्शन चक्रज्योतिषाचार्य संतबेतरा अशोका की दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर की गई भविष्यवाणी अब सच होती नजर आ रही है, हालांकि भविष्य की गर्भ में क्या है, इसका पता तो 10 फरवरी को ही चलेगी। प्रैसवार्ता को मिली जानकारी के अनुसार सुदर्शन चक्रज्योतिषाचार्य संतबेतरा अशोका ने 11 मई 2014 को एक भविष्यवाणी की थी, जिसमें उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए 4 अंकों का चयन किया था, जोकि 6, 3, 7, 0 थे। अगर हम दिल्ली विधानसभा चुनाव पर एक नजर डाले तो पता चलेगा कि इस बार दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए 673 उम्मीदवारों ने अपना भाग्य अजमाया है, जिसमें 63 महिलाएं है और 67 प्रतिशत ही दिल्ली में मतदान हुआ है एवम् भाजपा के 67 विधायक भारी बहुमत से जीतने का दावा कर रहे है। उपरोक्त 4 अंकों के आधार पर एग्जिट पोल को मद्देनजर रखते हुए दिल्ली में भाजपा की ही सरकार बनेगी। चूंकि यह भी हो सकता है कि भाजपा को 63 की बजाए 36, आम आदमी पार्टी को 34, कांग्रेस व अन्य को 0 सीटें मिल सकती है। संतबेतरा अशोका की भविष्यवाणी के अनुसार 10 फरवरी का दिन भाजपा के   लिए जश्र का दिन हो सकता है, जबकि आम आदमी पार्टी व अन्य के लिए निराशाजनक। लेकिन भविष्य की गर्भ में क्या है, ये तो 10 फरवरी को ही पता चलेगा।

साक्षात्कार : लोक संस्कृति के मर्मज्ञ साहित्यकार ओमप्रकाश कादयान

6:43:00 PM
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हरियाणवी बोली को पहला लघुकथा संग्रह देने का श्रैय साहित्यकार ओमप्रकाश कादयान के खाते में है। हरियाणा की मिटटी की सोधी खुशबू को अपने कैमरे, कलम व ब्रश के माध्यम से जन तक ले जाने का साहित्यकार ओमप्रकाश कादयान का अपना अंदाज है। झज्जर जिले के बेरी में जन्में प्रसिद्ध छायाकार, लोक संस्कृति के मर्मज्ञ ओमप्रकाश लगभग तीन दशकों से हरियाणवी लोक कला संस्कृति के संजृन में लगे हुए है। देश की शायद ही कोई स्तरीय पत्रिका या समाचार पत्र होगा, जिनमें इनकी रचनाएं ना छपी हों। उनकी 5हजार से अधिक रचनाएं, 15हजार से अधिक छायाचित्र, 3हजार से अधिक रेखाकंन, 250से अधिक पुस्तक समीक्षाएं पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी है। दर्जनों साहित्यिक पुस्तकों के कॅवर पर उनके चित्र छप चुके है। उनकी लिखी रचनाएं हिन्दी एम.ए. की कक्षाओं में पढ़ाई जा रही है। दूरदर्शन,अकाशवाणी केन्द्रों से इनकी वार्ताएं प्रसारित होती रही हैं। उनके चित्रों की प्रदर्शन विभिन्न विश्वविद्यालयों में लगाई जाती रहती है।  हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा विशेष अकादमी सम्मान से सम्मानित किया गया। प्रकाशित पुस्तकें की बात करे तो हरियाणा के लोकगीत भाग-2, हरियाणा की सांस्कृतिक धरोहर, हरियाणा की सांस्कृतिक विरासत, आन्ध्यां की लाठी(हरियाणवी का पहला लघुकथा संग्रह), कैक्टस के फूल (लघुकथा संग्रह), हम पंछी नील गगन के (बालगीत संग्रह) आदि है। भविष्य में कई अन्य योजनाओं पर उनका काम चल रहा है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी ओमप्रकाश कादयान सरल व मिलनसार स्वभाव के है। वैसे तो ओमप्रकाश कादयान कई विधाओं पर लिखते हैं, किन्तु लोक पर केन्द्रित साहित्य सृजन इनका मूल विषय है। इसी विषय पर उनके वार्ता करने का अवसर प्राप्त हुआ उसी मुलाकात के कुछ अंश - 
नवल सिंह - आपकी विधाओं में हरियाणा के गांवों की मिट्टी से उपजी दिल को छू लेनी वाली सवेदनाओं का क्या राज है?
ओमप्रकाश- हरियाणा के गांव में जन्मा, देहात की मिट्टी में खेल-कूद कर पला बड़ा हुआ, इसी मिटट्ी की गोद में बैठ कर अपनी रचनाऐं रची तो देहात की संस्कृति से, वहां की जमीन से जुड़ाव कैसे ना होता। उस महक का, उस भावना का विधाओं में उमडऩी लाजमी है। 
नवल सिंह- छायांकन (फोटोग्राफी) में गांव या शहर में कहां बेहतर महसूस करते है?
ओमप्रकाश- छायांकन का कोई वक्त नहीं, कोई स्थान नहीं पता नहीं। दृश्य को पहचाना होता है,चित्र खोजना होता है। पर चुकि गांवों हमारी जड़ें है वहां कला-संस्कृति का वास है। खेत-खलियानों व पगडण्डियों में प्रकृति का वास है जिसमें छायांकन की आत्मा बसती है। 
नवल सिंह- आपकी कथाओं में, रेखाकंन में, छायाचित्रों में व लेखन में प्रकृति का खासा असर देखा जाता है। प्रकृति से लगाव का कोई खास कारण?
ओमप्रकाश-बचपन से है, बच्चे थे तो गांव की बणी में (लघु जंगल), तालाबों पर, नहर पर, खेतों में, खूब घूमते थे। मैंने संस्कृति को जीया है प्रकृति से सीधे तौर पर साक्षात्कार किया है जिससे लगाव होना स्वाभाविक है। हर साहित्यकार का संजृन के लिए प्रकृति से संवाद होना जरूरी भी है।
नवल सिंह- चर्चा में है कि आप लोकगीतों को लेकर किसी बड़ी योजना पर काम कर रहे है इसमें बारे में कुछ बताऐंगे?
ओमप्रकाश- नवल जी, लोकगीत लुप्त होते जा रहे है इन्हें संग्रहीत करने के उददेश्य से मैने हरियाणा के गांवों की निरन्तर यात्राएं की, गांव की गलियों में, कच्चे-पक्के घरों में जाकर लेखन, छायांकन किया। जिसमें अधिकतर यात्राएं मोटरसाइकिल पर रही। लोकगीतों का बड़ा संग्रह किया। हरियाणा ग्रन्थ अकादमी ने इनमें से लोकगीतों से सम्बन्धित सामाग्री को हरियाणा के लोकगीत भाग-2 पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है। जिसे बेहद सराहा गया। इसी तरह से बिश्नोई समाज से सम्बन्धित लगभग 800 गीतों को भी मैंने जुटाया है। लोकगीतों को लेकर योजना यह है कि कम से कम दस हजार लोकगीतों को लेकर एक पुस्तक का प्रकाशन किया जाए।
नवल सिंह- आधुनिकता की आंधी में लोकगीत अन्तिम सासें ले रहे है इसे आप किस रूप में देखते है?
ओमप्रकाश कादयान- सबसे पहले तो हमें इस बात को समझना होगा कि हमारे लोकगीत उत्पादन से जुड़ी पैदायश है। जिसमें सामुहिकता का महत्व है। शादी-विवाह,जन्म-मृत्यु, खेत जोतते हुए, दूध बिलौते हुए,पनघट पर, फसल कटाई के वक्त इत्यादी समय पर गीत रचे व गाऐं जाते रहे है। गांव में कच्चे मकानों को लीप कर चित्रकारी की जाती थी। चुनर, ओढनी, पंखी के कलात्मक रूप के साथ चरख पर सूत कात कर घर-घर में कला संस्कृति को पीढी दर पीढी चलाया जा रहा था। समय बदला,परम्परा बदली पर अभी भी गांवों में गीत है जिन्हें सहेज कर आगे ले जानी की जिम्मेवारी हमें निभानी होगी। 
नवल ङ्क्षसह- कादयान जी आप क्या समझते है कैसे लोक साहित्य को बचाया जा सकता है?
ओमप्रकाश कादयान- जैसा मैंने पहले बताया सहेजना, यही इसका उपाय है हमें लोकसाहित्य जैसे गीत, लोक कथाएं, लोकगाथाएं इत्यिादी को संग्रहित करना होगा। दूसरा युवाओं में,युवतियों में लोक साहित्य के प्रति लगाव पैदा करना होगा ताकि प्रतियोगिता के युग में हम अपनी जमीन से दूर ना हो।
नवल ङ्क्षसह- हरियाणा के बारे में कहा जाता रहा है कि यहां कल्चर के नाम पर सिर्फ एग्रीकल्चर है, इसे आप ने इसे झुठला कर लोकसाहित्य को नए आयाम दिए है। पर आज आप साहित्य सृजन को किस स्थिती में देखते हैं?
ओमप्रकाश कादयान- आज स्थिति चिन्तादायक तो है पर सुखद भी कही जा सकती है। नवल जी आज हरियाणा में दर्जनों साहित्यकार हरियाणवी बोली को लेखन का माध्यम बना रहे हैं। कालजयी साहित्य रचा जा रहा हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी और हरियाणा ग्रन्थ अकादमी के प्रयास भी सराहनीय है। निरन्तर लेखन से हरियाणवी बोली का स्वरूप हरियाणवी भाषा के रूप में निखरने लगा है। इस बीच कुछ हल्का साहित्य है जिससे हरियाणवी बोली की छवि बिगड़ती है इसे छोड़ कर रचानत्मक,समद्ध साहित्य लेखन की ओर साहित्यकारों को बढऩा होगा। 
नवल सिंह- भविष्य की पौध कहे जाने वाले विश्वविद्यालयों को हरियाणवी संस्कृति या लोक साहित्य को प्रकाश में लाने में या कहे तो शोधकार्य करवाने की क्या भूमिका रही हैं? हरियाणा में इसे आप किस रूप में देखते है?
ओमप्रकाश कादयान- हरियाणा के विश्वविद्यालयों के प्रयास नाकाफी रहे है ऐसा मेरा मानना है। कारण रहा कि कई विभागों के शिक्षक प्रदेश से बाहर के रहे,इसी आधारभूत कारण में उन्होंने शोध कार्य ना के बराबर करवाएं। पर हम यहां सकारत्मक योगदान की बात करे तो डॉ.जयभगवान गोयल (कु.वि.कु.) भीम सिंह मलिक (कु.वि.कु.) डॉ पूर्णचन्द शर्मा (म.द.वि.) जैसे कुछ ही प्रोफेसर या प्राध्यापक थे जिन्होंने लोक साहित्य पर विशेष ध्यान दिया। दीर्घ उपेक्षा उपरान्त कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागध्यक्ष डॉ.लालचन्द गुप्त मंगल, प्रो.बाबूराम ने शोधकार्य करवाए, पाठ्य पुस्तकों का सम्पादन किया वह सराहनीय है। डॉ. महासिंह पूनिया ने धरोहर के माध्यम से बहूत बड़ा काम किया है। विश्वविद्यालय की पत्रिका सम्भावना को दूरदृष्टि से देखा जाना चाहिए। महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय हरियाणा अध्यन्न केन्द्र के निदेशक एवं लोक प्रशासन विभाग के प्रो.एस.एस.चाहर 2010 से लगातार जनरल ऑफ प्यूपल एण्ड सोसाइटी ऑफ हरियाणा निकालकर महत्वपूर्ण योगदान दे रहे है। हकृवि हिसार द्वारा हरियाणवी भाषा व लोक कला पर केन्द्रित एम.ए.डिप्लोमा अच्छा प्रयास है। पर ये प्रयास पहले होते तो आज और भी सार्थक परिणाम होते। 
नवल ङ्क्षसह- आपने बताया कि आज दर्जनों साहित्यकार साहित्य संस्कृति पर बेहतर लिख रहे, पाठकों को उनके बारे में बताए जो इस साधना में लगे है?
ओमप्रकाश कादयान-जैसे मैने पूर्व में कहा है कि आज साहित्यकार गुणात्मक साहित्य का संजृन कर रहे है जिसमें बात करे तो डॉ.पूर्ण चन्द शर्मा, डॉ.जयनारायण कौशिक, राजकिशन नैन, रणबीर सिंह, रामफल चहल, डॉ.श्याम सखा श्याम, डॉ.लालचन्द गुप्त मंगल, डॉ.बाबूराम, डॉ.महासिंह पूनिया, डॉ.रामनिवास मानव, भारत भूषण सांघीवाल, राजबीर देसवाल, डॉ.सन्तराम देसवाल, डॉ.विश्वबन्धु शर्मा, रोहित यादव, मदन गोपाल शास्त्री, डॉ.सुधीर शर्मा, जगबीर राठी, सत्यवीर नाहडिय़ा, हलचल हरियाणवी, मास्टर महेन्द्र, आलोक भाण्डोरिया, सुरेश जांगिड़, हरिकृष्ण द्विवेदी, डॉ.सुमन कादयान, डॉ.लक्ष्मण सिंह, रामफल खटकड़, रामधारी खटकड़, शमीम शर्मा, रामफल गौड़, डॉ.सुभाष, रामकुमार आत्रेय, डॉ.सावित्री वशिष्ठ, डॉ.राजबीर धनखड़, सुमेर चन्द, भगवान सिंह अहलावत, नरेन्द्र अत्री आदि लोकसंस्कृति लेखक, कवि अपने स्तर पर प्रयासरत हैं। 
नवल सिंह- नवोदित साहित्यकारों को,पाठकों को क्या सन्देश देना चाहते है?
ओमप्रकाश कादयान- हमारे आस-पास एक जीवन है कला-संस्कृति का जिसे हम पहचान कर जीने लगे तो तमाम तरह के तनाव से हमें मुक्ति मिल जाऐगी पर हम जंगल के मृग की भांति  कस्तुरी लिए संगुन्ध की तलाश में भटकते रहते है। नवोदित साहित्यकारों को चाहिए की हल्के,अश£ील जैसे जल्द प्रसिद्धी के लेखक को छोड़कर कर कालजयी साहित्य को रचे यह मुश्किल जरूर है पर यही है जिससे चिरकाल तक उनका नाम साहित्य की दूनियां को प्रकाशित करता रहेगा। पाठक, पं्रशसकों से भी अनुरोध है कि वो किसी भी साहित्यिक विद्या पर अपनी प्रतिक्रिया से साहित्यकार को कलाकार को अवश्य परिचित करवाए जिससे उन्हें भी उम्दा संजृन में मदद मिले। (नवल सिंह, प्रैसवार्ता)

पेरिस के जाबाज पत्रकारों को याद करते हुए: अगर हमारी कलम बन्दूक का सामना करने को तैयार नहीं तो अगला नम्बर हमारा है!

12:54:00 PM
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उन्होंने बन्दूक को फिर से कलम के मुकाबले में ला खड़ा किया। हरियाणा में पत्रकार छत्रपति की विरासत के पत्रकार इस बात को बेहतर समझ सकते है। 
कोई भी धर्म या विचारधारा इंसानियत से बढ कर नहीं होती धर्म के नाम पर हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता। पर दिमागी रूप से बिमार मानसिकता के लोगों को यह समझाना बेहद कठिन होता जा रहा है कि इस तरह के हमले वहशीपन है धर्म युद्ध नहीं। जटीलता ये भी है जब कुछ कुन्ध मानसिक रोगी खुले आम या दबे-छुपे इन हमलों भी अपना हित साधने की कोशिश करते हुए एक धर्म को दूसरे से बेहतर बताने की कोशिश करते है। आइए इस घटना के विभिन्न को जानने की कोशिश करते है।
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर हमला- पेरिस में व्यंग्यात्मक मैगजीन शार्ली एब्दों के ऑफिस पर तीन आंतकवादियों ने हमला करके बुद्धवार 12 लोगों की हत्या कर दी गई, 10 अन्य घायल हो गए,इसमें दो पुलिसकर्मी भी शामिल है। मौका वारदात के ब्यान अनुसार हमलावर चिल्ला रहे थे कि हमने पैगम्बर का बदला ले लिया है। मैगजीन एडिटर-इन-चीफ स्टीफेन की आंतकी हमले में मौत हो गई। प्रेंच मिडिया द्वारा हमलावरों का अलकायदा से सम्बध बताया जा रहा है। ताजा जानकारी में हमले में जुड़े युवा हमलावर मोराद ने बुद्धवार रात 11 बजे खुद को पुलिस के हवाले कर दिया। कटटरपंथी हमले में मारे गए पत्रकारों के समर्थन में दुनिया भर के मिडिया सहित अन्य तबकों से श्रंदाजलि संदेश सोशल मिडिया पर आ रहे है। जिसमें मानवता के हत्यारों को लानते भेजी जा रही है।
मैगजीन का इतिहास
साप्ताहिक पत्रिका शार्ली अपने छपने कार्टूनों को लेकर हमेशा चर्चा में रहती है। वर्ष 2012 में पैगंबर मोहम्मद का कार्टून बनाने को  लेकर विशेष चर्चा में रही। मैगजीन ने हाल ही में आतंकी संगठन आईएस के चीफ बकर अलबगदादी का भी कार्टून छापा था। मैगजीन में ईसा मसीह, ईसाइयत और फ्रंास के नेताओं पर भी करारे व्यंग्य किए है। फा्रंस में सिर उठाते कटटरपंथीयों को लेकर समय-समय पर सवाल भी उठाए गए,  2011 नवम्बर 2 को भी मैगजीन के आफिस में फायर बम्ब से हमला किया गया तथा मैगजीन की साईट को हैक कर लिया गया जिसके बाद मैगजीन को नए ऑफिस में शिफट होना पड़ा। मैगजीन ने इसके बाद 2012 में कार्टूनों की पूरी सीरीज को छापा। यह सीरीज उस वक्त छपी जब इस्लाम पर आधारित एक फिल्म के विरोध में मिडल ईस्ट में अमेरिका के दूतावासों पर हमले हुए थे। पर मैगजीन ने अभिव्यक्ति की स्वतत्रता को लेकर कभी भी कोई समझौता नहीं किया। 
कटटरता का धर्म कत्ल
यह फार्मुला संसार के सभी धार्मिक कटटरपथी, अन्ध-धर्मीयों ने अपना रखा है वे अपने विरोधी विचार को कल्त कर शान्त करने में यकीन रखते है। यही उन्होंने फ्रांस में जाबाज पत्रकारों के साथ किया जब वो कलम के सिपाई धमकियों से नहीं डरे तो आंतकियों ने बन्दूक की गोलियँा उनकी छाती में निर्ममता से उतार दी।  प्रेस पर किया गया ये कु्रर हमला बेहद निन्दनीय है। ऐसे समय में जरूरी हो जाता है विश्व के अन्य पत्रकार साथी अपनी एकजुटता दिखाते हुए शार्ली मैगजीन के रूके काम का आगे बढाए। 
एकजुट विरोध जरूरी
ऐसे समय में शहीद भगत सिंह की जेल डायरी में दर्ज माक्र्स की नोटस का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है कि धर्म अफीम है। निसन्देह इसी नशें में इन्सान हैवान बन जाता है। पर इसी बीच कुछ लोग प्रकाश पुंज बन रहे है। एक साईट पर मुस्लिम साथियों ने खुलेआम लिखा एक - मैं मुस्लिम हँू और मेरा मानना है कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब है इस्लाम समेत हर धर्म पर व्यंग्य करना, एक दूसरे मुस्लिम ने लिखा कि- मेरा परिवार फ्रेंच है मेरा परिवार मुस्लिम है मैं पत्रकार हँू हम दूख में है। दूनिया भर से इस हमले के विरोध में आवाज बुलन्द हो रही है। हिम्मत दिखाते हुए उन कार्टुनों को पोस्ट किया जा रहा है जो काम मैगजीन कर रही थी। इस बीच यह बात सौ प्रतिशत सच है कि दुनिया को खतरा उन 1 प्रतिशत लोगों से नहीं है जो आंकतवाद फैलाते है। बल्कि खतरा उन 99 प्रतिशत लोगों से है जो उन 1 प्रतिशत की करतूतों पर चुप्पी साध लेते है। पत्रकारों पर अभिव्यक्ति पर इस कु्रर, वहशी हमले के जवाब में हर कलम के सिपाई को लिखना होगा, समझना होगा ये आग किसी की सगी नहीं हर देश की सीमा के बाद ये रूप बदलती है। इसका धर्म घर जलाना है, आंतक फैलाना है। इनका धर्म कुछ भी हो सकता है पर ये मानव नहीं हो सकते।(नवल सिंह, प्रैसवार्ता) 

वर्ष 2015 का भविष्यफल

3:06:00 PM
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वर्ष 2015 का आगमन कन्यालग्रस्थ राहु प्राक्रम भावस्थ वृश्चिक राशिस्थ शनि(जो नरेंद्र मोदी की जन्म राशी है) चतुरथ भावस्थ बुद्ध-आदित्य योग आय भावस्थ उच्चस्थ बृहस्पति जो चतुरयेश एवं सप्तमेश है एवं पंचम भावस्थ शुक्रमंगल योग एवं अष्टम भावस्थ चंद्रमा के कारण निम्र फल कारक रहेगा। चंद्रमा से चतुरथ भावस्थ उच्चस्थ बृहस्पति प्रबल गजकेसरी योग एवम् सुख भावस्थ बुद्ध आदित्य योग के कारण भारत में हिंदुत्व की प्रबल सुनामी ए/एल इनीशयल के विपक्षी नेताओं के राष्ट्र एवं हिंदुत्व विरोधी वक्तव्यों के कारण भारत में राष्ट्र-प्रेम, राष्ट्र-हित एवं हिंदू-राष्ट्र प्रेम को भावना प्रत्येक जनमानस में दिखाई देगी, जो क्षेत्रीय दलों के लिए अनिष्टकारक साबित होंगी।
20 जनवरी से 26 जनवरी 2015 में देश में भगवा लहर के विरूद्ध तहत प्रमुख क्षेत्रीय दलों को एक साथ लामबन्ध होना एवं देशहित कार्यो में सरकार की आलोचना के कारण क्षेत्रीय दलों का प्रभाव शून्य दिखाई देगा।
मंगल शुक्र युति पर शनि दृष्टि के कारण देश में नारी सम्मान के प्रति जनजागृति के कारण अप्रिय घटनाओं में बहुत कमी आएगी। शुक्र भाग्येश एवं द्वितीयेश होकर पंचम भावस्थ है। उच्चस्थ मंगल युति एवं प्राक्रमभावस्थ शनि दृष्टि के कारण दमनकारी नीति एवं कानून के कारण स्त्री-रक्षा में विशेष कामयाबी मिलेगी।
वर्ष 2015- विद्यटनकारी ताकतों के लिए विनाशकारक साबित होगा। अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर मोदी के प्रयासों के फलस्वरूप भारत का नाम सुर्खियों में रहेगा।
आतंकवादी संगठन अव्यवस्था फैलाने की कोशिश करेंगे। उत्तरप्रदेश में राष्ट्रपति शासन की संभावना दिखाई देती है। अखिलेश को विशेष एहतियात बरतनी होगी। ए/आर/वाई इनीशयल के राष्ट्रीय नेताओं को अनियंत्रित वाणी का खामियाजा देश की शक्ति के लिए हानिकारक साबित होगा एवं धुव्रीकरण कारक होगा, जिसका असर विहार-उतरांचल एवं हिमाचल प्रदेश के चुनावों में दिखाई देगा।
वर्ष 2015 में मोदी सुनामी का परचंम एवं भगवा क्रांति के कारण राजधानी दिल्ली के चुनावी परिणाम एक तरफा होंगे। भाजपा 63 सीटें प्राप्त करेगी। किसी एक राष्ट्रीय दल का सूपड़ा साफ होगा।
2015 में क्षेत्रीय दलों का एकीकरण क्षेत्रीय दलों के लिए विशेष दुर्भाग्यपूर्ण साबित होगा। ए/एल/आर/टी इनीशयल के क्षेत्रीय नेताओं की अनियंत्रित वाणी के कारण एवं अगलवादी ताकतों को शह के कारण सरकार को कठोर निर्णय लेने पर वांछित होना पड़ेगा।
धर्मान्तरण विरूद्ध कानून पारित होगा। विपक्ष प्रत्येक फ्रंट पर नाकामयाब साबित होगा।
कालेधन के मुद्दे पर सरकार वर्ष के अंत तक कामयाब होगी। विपक्षी धु्रवीकरण को मुंह की खानी पड़ेगी। कुल मिलाकर वृश्चिक राशी नरेंद्र मोदी शनि ग्रह के प्रभुत्व के कारण प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करेंगे। अंर्तराष्ट्रीय पटल पर भारत विश्व की प्रमुख शक्ति(अमेरिका) के सहयोग से 2015 वर्ष के अंत तक उग्रवाद पर अंकुश लगाने में सफलता प्राप्त करेगा।
                                                                                 (संतबेतरा अशोका,  मो. 9990014155)

श्रद्धांजलि : धीरज........ जिसके ना होने से हम सब धीरज खो रहे है!

12:05:00 PM
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ये मेरा मुगालता यानी वहम भी हो सकता है जिसे मैं हमेशा मानता हँू कि आत्महत्या हत्या से बडा साहस या दुसाहस का काम है। ये वो फैसला है जिसे समय व्यक्ति जिन्दगी के उपवन में खड़े होते हुए भी मौत के मुहाने पर खडे लेकर लेता है। जिन्दगी उसकी इच्छा होती है और मौत की बहुत गहरी वजह जिसे बाद का समाज खोजने का दावा भी करे तो इन्सान के उस समय के जज्बात को समझा नहीं जा सकता, जो समय वो इस निणर्य को लेते हुए जी चुका होता है। बेशक उन कागजों के पन्नों के राज कुछ भी रहे जिसे धीरज ने अन्तिम यात्रा से पहले संजोने की कोशिश की, पर उन पीडा के पक्षियों को ........हम नहीं पकड सकते जिन्होंने धीरज के मन में जन्म लिया और धीरज अपने साथ उन्हें भी मुक्त कर दिया। आप देखे पांच पन्नों को उसने लिखा पर उस धीरज नाम की कलम को अभी भी बहुत कुछ लिखना था अभी स्क्रीट और भी थी पर मुक्ति का दवाब इस कदर ज्यादा था कि उसे लेटलतीफी स्वीकार नहीं हो रही थी। दोराहें की सभी बात करते है पर धीरज ने र्थडवे की बात की,उसे स्थापित करने में अपनी उर्जा को उसने लगा रखा था। 
कई मित्र इस समय गहरा मानसिक विषाद भी झेल रहे है उन्हें लगता है कि अगर उनकी धीरज से बात हो जाती तो शायद ये दुख:द हादसा इतिहास में दर्ज ना होता। एक मित्र उसका फोन ना अटेन्ड न कर पाने के लिए खुद को माफ नहीं कर पा रहे। जिससे इस मर्म को समझा जा सकता है कि धीरज पत्रकारिता में ही नहीं, प्यार से हर दिल में बस जाने में माहिर था। सोशल साईट पर लगातार पोस्ट आ रहे है, पोस्ट अकसर औपचारिकता होते है पर इन पोस्टों को पढते हुए लगता है धीरज एक वट वृक्ष की तरह अपनी जंडे दूर तक फैला ले गया था कईयों के भीतर वो फिर से अंकुर बन फुट रहा है लुप्त नहीं हुआ। बडे भाई या छोटे भाई के सम्बध, दुख की अभिव्यक्ति आंसुओं संग शब्दों में हो रही है। ऐसा लगता है सब अपने शब्द संग दहाड़े मार कर रो रहे हैं। 
एक पत्रकार एक इन्सान भी होता है उसके भी अपने सुख-दुख,अपनी पीडा,अपना मान-सम्मान, अपने सपनें होते है। जिनके साथ 24 घण्टे सात दिन वो दर्जनों जिन्दगियों को भी जीता है। किसी सही न्युज की प्रंशसा उस तक पहुचे या ना पहुचें पर आलोचना पहुचनी तो तय होती ही है ऐसी ही कुछ जिन्दगी धीरज ने भी जी। शायद इसी आपोधाप में वो खुद को किसी के सामने खोल ही नहीं पाया और हम उसके नीजी, घनिष्ठ होने का दम भरते हुए आज सफर में अकेले है। पर नहीं, इसकी  एक वजह और रही होगी धीरज अपने मित्रों के चेहरों पर चिन्ता परेशानी कहां देखना चाहता था। अब तो बस बातें है कि धीरज ऐसा था,धीरज वैसा था कुछ नहीं है तो वो है धीरज, जिसके ना होने से हम सब धीरज खो रहे है।(नवल सिंह, प्रैसवार्ता) 

पत्रकार धीरज बजाज: बुझ चुकी है शमां मगर रोशनी महफ़िल में है..

10:48:00 AM
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सिरसा के पत्रकार धीरज बजाज नही रहे, धीरज बजाज का आकस्मिक निधन' सोशल साइट्स और अखबारों में ये दुखद खबरें देखकर हम सबके दिलों को जो ठेस पहुंची है, उसको लिख बोल कर ब्यान कर पाना सम्भव नहीं है। गुणी कलमकार धीरज बजाज के रुखसत होने के बाद उनके तमाम चाहने वाले खुद को हद से ज्यादा गमगीन, अकेला एवं ठगा सा महसूस कर रहें हैं। उनके जाने के बाद समूचा पत्रकारिता जगत आहत है। छोटी सी उम्र में पत्रकारिता के नये आयाम छूने वाला धीरज हमारे बीच एक ऐसा रिक्त स्थान पैदा कर गया जिसकी भरपाई निकट भविष्य सम्भव नही है।  कलम के सिपाही धीरज ने खुद को खत्म करने से पहले बेशक इंटरनेट की सोशल साइट्स से स्वयं से जुड़ी तमाम लेखन सामग्री और फोटोज तो सब रिमूव कर दिए हों लेकिन धीरज अपने हंसमुख स्वभाव अपने उल्लेखनीय कामों के कारण हम सबके दिलों में हमेशा हमेशा जिन्दा रहेंगे।
उनके जाने के बाद उनको समर्पित ये श्रद्धान्जलि लेख लिखते हुए कितना दुखी हूँ, कितना टुटा हूँ ? मेरी आत्मा ही जानती है कि मैं किस स्थिति में कंप्यूटर के सामने बैठा टिक-टिक कर अपने उस हसीं दोस्त के लिए लिख पा रहा हूं। यूँ तो दरअसल मेरा काम लिखना ही है और पिछले 10 सालों में मैंने न जाने कितनी दोस्ती, हादसे, मौत, सुसाइड और न जाने किस प्रकार की खबरें और स्टोरियां बनाई होंगी। एक कलमकार होने के नाते काफी कुछ लिखा है। मगर मेरे साथ ये पहली बार हुआ है कि आज मैं कुछ लिख रहा हूँ तो अन्दर से पूरा टूटकर ही लिख पा रहा हूँ। बार बार आ रहे अश्कों के चलते की-बोर्ड के साथ ही रखे रुमाल को उठाकर आँखे मल रहा हूँ। बेशक आजकल फेसबुक और फोन के अलावा मेरा सीधा संपर्क धीरज से नहीं था, मगर उनके चले जाने के बाद यूं लग रहा है जैसे मेरा कोई ख़ास अपना चला गया हो। उनके साथ दिन बिताने वाले तमाम दोस्त मानते हैं कि उसके साथ रहने से ऐसा लगता था कि हमारे सामने हर बड़ी से बड़ी जंग भी साधारण सी बात है। 
दरअसल पिछले करीब 7-8 सालों से मेरा उस युवा सोच के साथ जुड़ाव था, जो हर वक्त समाज, घर परिवार, रिश्ते नाते और अपने कर्तव्य की डोर से बंधा रहता था। हमेशा सच की राह में बेख़ौफ़ बढऩे की बात करना और जैसे उसके ख्याल ऊंचे थे कमोबेश ऐसा ही व्यवहार भी उसका बखूबी बना रहता था। समझ नहीं आ रहा कि दूसरों की परवाह करने वाला शख्स धीरज बजाज इतना सुपर मेच्योर होने के बावजूद अधीर कैसे हो गया? आखिर कौन सी ऐसी टीस थी जिसने उस कलम के जांबाज को अपने हाथों अपनी ही जीवन लीला समाप्त करने को मजबूर कर दिया ?  
बेशक उम्र के लिहाज से वह एक रोमैंटिक से स्वभाव के नवयुवक मालूम पड़ते थे, मगर लेखन में उसके काम करने का ढंग हर कलमकार के लिए एक खुबसुरत प्रेरणा है। उसने हम सब कलमकारों को बहुत कुछ सिखाया जो अमूल्य है। एक साधारण पत्रकार से जिला प्रमुख खबरनवीस व सांध्य अखबार थर्ड वे के सम्पादक तक का उनका सफर कलमकारों के लिए एक प्रेरणामयी मिसाल है। तमाम कलमकार साथी तीन दिसंबर के उस मनहूस दिन को अपने जीवन में कभी नहीं भुला पाएंगे जिस दिन ने हर दिल अजीज कलमकार धीरज को हमसे हमेशा हमेशा के लिए छीन लिया। लेखन की कठिन राहों पर चलकर समाज भलाई कार्यों के लिए सबको प्रेरित करने वाला धीरज बजाज वही युवक था, जिसने अपनी ताकतवर कलम से सिरसा के प्रशासनिक तंत्र को श्रम करो या शर्म करो जैसी पंक्तिया लिखकर जनहित के काम करने को मजबूर कर दिया था। जिन्दगी से थका हूँ हारा नही हूँ ' ये वाक्य अकसर दोहराने वाले धीरज का धेर्य किन विकट हालातों में जवाब दे गया, ये प्रश्न समूचे सिरसावासियो व उसके सभी मित्र प्यारों को अंदर ही अंदर कचोटता रहेगा। सभी दोस्त उसे अलग-अलग नाम से पुकारते थे और धीरज ने सभी नामों को स्वीकार किया और पलट कर कभी किसी का उपहास नहीं उड़ाया। भले ही वह खुद हंसी मजाक का पात्र बना रहा हो। आखिर समाज के लिए समग्र विकास, नई दिशाएं, युवाओं के लिए रोजगारपरक राहों का ख्वाब देखने वाले धीरज ने स्वयं के लिए ऐसी दिशा चुनी जिस दिशा में मिलती है निराशा, पीड़ा, दर्द, आहें। प्रिय धीरज। खुदा जाने अचानक तुम इस दुनिया से खफा क्यों हो गये। धीरज काश। कि तुम आकर अपने निधन खबरों को झूठा साबित कर पाते। काश तुम ऑनलाइन होकर अपने तमाम चाहने वालों को कह पाते कि यार "तुम सब कैसे हो"
काश तुम मेरी लिखी गजलों पर अपने खुबसुरत कमेन्ट कर पाते। काश तुम अपने थर्ड वे नामक सोशल पेज को अपने विचारों एवं अपने अखबार के पन्नो से अपडेट कर पाते। 
.... लेकिन...सच है ऐसा नही होगा अब तुम कभी नही आओगे मगर तुम्हारा हौंसला, जज्बा और बेख़ौफ़ कलम चलाने का अंदाज हम सबके दिलों में आपके होने का अहसास कराता रहेगा।
धीरज बजाज के लिए लिखने को अंदर ही अंदर अल्फाज तो बहुत ज्यादा उमड़ रहे हैं, बहुत कुछ उनके लिए लिखने की तमन्ना है लेकिन यकीन मानिए आगे लिखने की हिम्मत नहीं हो पा रही है।
मैं मानता हूं कि होता वही जो मंजूरे खुदा होता है" जो धरती पे दिखता है वो नश्वर है, अस्थायी है। लाजमी है एक दिन वो सब फनाह होगा ही होगा, मगर कुछ शख्सियतें ऐसी भी है जो जाने के बाद समाज को अपनी कमी महसूस करा जाती हैं। अपनी कलम से नई इबारत लिखने वाला धीरज अब कभी मुड़कर नहीं आएगा और उसकी कमी हम सभी को दुखी करती रहेगी। अंतिम संस्कार के दौरान उसे श्रद्धांजलि देने पहुंचे लोगों की बड़ी भीड़ से भी यह बात पुख्ता होती है कि उसने हजारों लोगों के दिल में अपनी अलग जगह बनाई है और यही बात उसने अपने अंतिम पत्र में लिखी है कि मैंने ऐसा कोई दोस्त नहीं बनाया जो मुझ से नफरत करे। 
यारों के यार, मेरे दोस्त धीरज मै यही कहूंगा कि तुम हमे बड़ा याद आओगे, तुम्हे भूल पाना नामुमकिन है। 
कहते हैं जो जख्म देता है वो मरहम भी जरुर देगा। मेरे पुरे परिवार की ओर से कलम के जादूगर धीरज बजाज को हार्दिक नमन और खुदा से दुआ करेंगे कि गमगीन परिवार को उनके बिछोड़े का गम सहन करने की ताकत बख्शे। आखिर यही कहूँगा कि -
तू नही तो क्या तेरी उल्फत अभी तक दिल में है।
बुझ चुकी है शमां मगर रोशनी महफिल में है।
त्रिदेव दुग्गल मुंढालिया, प्रैसवार्ता
युवा कवि एवं गजलकार, भिवानी

तुम बहुत याद आओगे धीरज

5:17:00 PM
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मैं ये लेख लिख रहा हूं तो मेरी आत्मा ही जानती है कि मैं किस स्थिति में कंप्यूटर के सामने बैठा टिक-टिक कर अपने दोस्त के लिए लिख पा रहा हूं। दरअसल मेरा पेशा तो खबर बनाना ही है और इन 18 सालों में न जाने मैंने दोस्ती, हादसे, मौत, सुसाइड और न जाने किस प्रकार की खबरें स्टोरियां बनाई होंगी, मगर अब मेरे साथ ये दूसरी बड़ी बात है कि मैं खबर नहीं लिख पा रहा हूं। पहला वाक्य तब हुआ था जब एक सड़क हादसे में सीनियर एडवोकेट जयमल सिंह की मौत हो गई थी और उस समय मैं दैनिक भास्कर में कार्यरत था, मगर उनकी खबर नहीं लिख पाया था। बेशक मेरा सीधा संपर्क उनसे नहीं था, मगर उनके चले जाने के बाद भी यूं ही लग रहा था कि मानों मेरा कोई अपना चला गया हो। इसका अर्थ ये कतई न निकाला जाए कि दूसरों की खबर बनाता हूं तो क्या वो अपने  नहीं, मगर सामाजिक लिहाज से जो ताना-बाना बना हुआ है उसी के संदर्भ में मैं ये कह रहा हूं या सबसे दुखद घडी अब आई है जब मेरी खुद की बाजू टूट गई है। उसके साथ रहने से यूं लगता था कि हमारे सामने हर बड़ी जंग भी साधारण सी बात है। पिछले करीब दस सालों से मेरा उस युवा सोच के साथ जुड़ाव था, जो हर वक्त समाज, घर परिवार, रिश्ते नाते और अपने कर्तव्य की डोर से बंधा रहता था। हमेशा आगे बढऩे की बात करना और जैसे ही उसके ख्याल ऊंचे थे कमोबेश ऐसा ही व्यवहार भी उसका बना रहता था। मुझे समझ नहीं आता कि दूसरों की परवाह करने वाला शख्स धीरज इतना धर्यवान होने के बावजूद अधीर कैसे हो गया? आयु में वह मुझ से करीब 10 साल छोटा था,मगर उसके काम करने का ढंग शायद उसने मुझे भी बहुत कुछ सिखाया है। लेकिन मैं तीन दिसंबर के उस मनहूस दिन को अपने इस जीवन में तो नहीं भुला पाऊंगा जिस घड़ी ने मुझे अपंग सा बना दिया। सही मायने में कहूं तो घर से निकलने के बाद ही मैं इंतजार के पल में बैठा रहता था कि अभी धीरज आने वाला है। सभी दोस्त उसे अलग-अलग नाम से पुकारते थे और धीरज ने सभी नामों को स्वीकार किया और पलट कर कभी किसी का उपहास नहीं उड़ाया। भले ही वह खुद मजाक का पात्र बना रहा हो। मगर मेरे तालुक्कात उससे वैसे नहीं थे। मुझे बड़े भाई के रूप में देखता था और मैं भी उसे अपने बेटे के लिहाज से देखता था। लेकिन सच कह रहा हूं कि आगे लिखने की हिम्मत नहीं हो पा रही है। मैं मानता हूं कि इस नश्वर युग में जो आया है, उसका जाना भी तय है, मगर कुछ शख्सियतें ऐसी भी है जिसके जाने के बाद आदमी या उसका परिचित खुद को समाज की भीड़ में अकेला खड़ा पाता है और आज शायद उनमें मैं भी हूं। अपनी कलम से दूसरों के लिए प्ररेणा पैदा करने वाला धीरज अब नहीं आएगा और उसकी खाली जगह हम सभी को सालती भी रहेगी चूंकि अंतिम संस्कार के दौरान उसे श्रद्धांजलि देने पहुंचे लोगों की भीड़ से यह बात पुख्ता होती है कि उसने हर किसी के दिल में अपनी जगह बनाई है और यही बात उसने अपने उस अंतिम पत्र में लिखी है कि मैंने ऐसा कोई दोस्त नहीं बनाया जो मुझ से नफरत करे। लेकिन मैं, मेरे दोस्त, मेरे भाई धीरज यही कहूंगा कि तुम बड़ा याद आओगे और आज तुने फिर इंतजार की राह पर लाकर खड़ा कर दिया है। मेरी ओर से धीरज को नमन और भगवान से दुआ करेंगे कि आपके परिवार को इस दुखद घड़ी में शक्ति दें।(अरूण भारद्वाज)

5 दिसम्बर 1991 काली,मनहूस शाम - आंतक ने बुझा दिए थे 27 घरों के चिराग

10:29:00 AM
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जख्म कैसा भी हो,वो एक ऐसा दर्द दे जाता है दर्द देता है, परिजनों को आँसूू बहाने के लिए एक शून्य जीवन। जिसको भरने के लिए दिन ही नहीं साल भी कम पड़ जाते हैं। जब ये घटनाएँ घटी होती हैं। इस विषय पर सोचते हुए एक बिन्दु जो विशेष तौर पर चोट करता है वो है कि क्यों कुछ इन्सान अपने तुच्छ स्वार्थों के हवन कुंड में संैकड़ों की बली देते हैं?  एक ऐसा दर्द जिसे टोहाना वासियों ने भोगा, उनसे लड़े और आज फि र पूरी शक्ति से जीवन संरचने में जुट गए। ये दर्द है परिजन खो चुके परिवारों का, ये दर्द है आतंक के पंजे का जिससे टोहाना ही नही पूरा राज्य कांप उठा था। 
पंजाब आतंक के बुरे दौर से गुजर रहा था इसी समय में पंजाब प्रान्त से जुड़ा छोटा सा कस्बा टोहाना भी आंतक की लपटों से खुद को बचा नही पाया। 5 दिसम्बर 1991 की काली,मनहूस शाम एक वाहन में आए आतकियों ने शहर के बीचों बीच अंधाधुन्ध फायरिंग की जिसने पुरे शहर को आतंक की चादर को ढक दिया चीखों-पुकार के साथ जगह-जगह गिरी लाशों ने हर किसी को एक बार तो सदमें में डाल दिया था । आज भी जब वो दृश्य टोहाना के नागरिकों के सामने आता है तो उनके रोगटे खड़े हो जाते हैं। 
5 दिसम्बर 1991 की वो काली शाम भुलाए नही भूलती जब एक आतंकी आंधी ने एक साथ 27 घरों के चिरागों को बुझा दिया साथ में दिए कभी भी न भुलाए जाने वाले जख्म। आंतकवाद की आग में सुलगते पंजाब की आँच कुछ ही पलों में तबाही मचा कर टोहाना की सड़कों को खून से भीगों दिया उग्रवादियों ने ए.के.47आधुनिक राईफलों से इस खूनी खेल को खेला । रोजमर्रा की तरह टोहाना शहर अपने कार्यों में लगा था दुकानदार दुकानों पर अपने ग्राहकों में व्यस्त थे शहरवासी अपने अपने कार्यो में लगे थे कर्मचारी अपने कार्यलयों से कार्य को निपटा कर जल्दी से घर चलने की तैयारी में लगे हुए थे पर शायद कोई भी नही जानता था कि आने वाले पल उनकी जिन्दगी को हिला कर रख देगे । तभी 5 बजे के करीब नेहरू मर्किट में एक वाहन में सवार होकर आए आतंकियों ने भरे बाजार में अंधाधुघ गोलीबारी करनी शुरू कर दी गोलियों की आवाज ने शांत शहर में भय का वातावरण पैदा कर दिया। 
गोलियों की आवाज को सुन  दुकानों के शटर धड़ाघड़ गिरने शुरू हो गए जो जहाँ बैठा था वहीं बन्द हो कर रह गया जो दुकानों से,मकानों से बाहर थे उन्होनें भाग कर अपने जीवन को बचाने की कवायद शुरू कर दी जिसे जहाँ पर जगह मिली वहीं पर वो भाग निकला। गोलियाँ 27 लोगों के जीवन को लील गईं 15 जिन्दगियाँ घायल हुई । घरौंडा के 4 व्यापारी भी इसी गोलीकाण्ड का शिकार हो गए शायद मौत ही उन्हें टोहाना खींच लाई थी। दु:खों का पहाड़ टूटा अर्जुन दास परिवार पर उनके साथ उनके युवा पुत्र विजय व अजय भी गोलियों की चपेट में आ गए। इस विषय को पहली बार लेखक द्वारा एक पुस्तक आततायी-एक श्रंदाजलि में विस्तार के घटना के साथ पीडित परिवार की व्यथा को लिखा गया, जिसका विमोचन गतवर्ष किया गया। इसी पुस्तक के एक अंश यहां भी श्रंदाजली के रूप में 
वो दिन बड़े ही दु:खदायी थे - 
वो दिन बडे ही दुख:दायी थे ऐसा लगा जैसे किसी भूकम्प ने हमारी गृहस्थी को ही तहस-नहस कर दिया हो। जज मडिय़ा व मानव सेवा संगम ने उस वक्त पूरी मदद की। सब जानते  है पिता का साया अकाल मृत्यु में सिर से उठने कितना तकलीफ देता है। उसके बाद मेरी जिन्दगी जीने की जंग शुरू हुई,हादसे के डेढ़ महिने बाद मेरे साथ अन्य सात पीडि़त परिवारों के सदस्यों को अस्थाई नौकरी मिली, 89 दिन की अस्थाई नौकरी में 80 दिन होते ही नौकरी से हटने व परिवार का पेट पालने की चिन्ता से दिमाग में भूचाल उठना शुरू हो जाता था, उस वक्त जिला मुख्यालय हिसार था।  योगराज के पिता भी हम लोगों के साथ थे उन्होनें भी  कई कष्ट भोगे,अकेली सन्तान के चले जाने के बाद कैसी जिन्दगी होती है मैं हम हर रोज उनकी आँखों में पढता था, आज भी उनकी आँखों में वही दर्द जिन्दा है। डेलीवेजीज पर हमें 20 जनवरी 1992 में नौकरी मिली। रैगुलर होने का वो वाक्या मुझे आज भी याद है जब एक उच्च अधिकारी को हमने अपनी दास्ताँ सुनाई तो उन्होनें एक कलम हमें 25 जुलाई 1995 से पक्का कर दिया हम उस अधिकारी का अहसान कभी नहीं चुका सकते। आज उस हादसें को बरसों गुजर चुके है। पीडि़त परिवारों में से कुछ शहर भी छोड़ चुके है। कुछ इस हादसे को याद भी नहीं करना चाहते,समय के साथ इस जिम्मेवारी को कुछ संस्थाओं व जागरूक नागरिकों ने माना है कि हमें इस गोलीकाण्ड के शहीदों को श्रृद्धांजली देनी चाहिए, पर टीस इस बात कि है कि  गोलीकाण्ड के शहीदों की याद में नेहरू मार्किट का नाम बदल कर शहीद मार्किट रखा गया था, पर प्रशासन की बेरूखी व लापरवाही के चलते इसे आज तक मंजूरी नहीं मिली। जिसको लेकर उनके मन में रोष है। वहीं स्मारक की बात एक दिन चर्चा में रहने के बाद हवा हो जाती है। (नवल सिंह, प्रैसवार्ता) 
-(आतंकी हमले में शहीद मैलूराम के पुत्र संजय मुखी ने जैसा लेखक नवल सिंह को बताया)

अश्रुपूरित विदाई....धीरज नहीं रख सका धीरज

10:13:00 PM
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सिरसा(दिनेश कौशिक)। दुबला पतला शरीर, चेहरे पर मुस्कराहट, पत्रकारिता क्षेत्र में रहकर समाजहित के लिए बहुत कुछ करने की आक्षाकाएं लिए हुए वह युवा धीरज बजाज शायद अब फिर कभी शारीरिक तौर पर नजर नहीं आएगा, मगर कम समय में अपने कार्यों के चलते अन्यों के लिए प्ररेणापुंज बन चुका धीरज अपनी सोच को अन्य लोगों के जहन में उतारने में सफल रहा। बेशक इस जिदंगी में भरपूर जीने की लालसा पर धीरज धीरज नहीं रख सका, मगर उसके चले जाने की स्थितियां अन्य करे अधीर जरूर कर गई कि आखिर अन्य को बेहतर जीवन जीने के लिए प्रेरित करने वाला खुद जिंदगी से रूसवा हुआ? पत्रकारिता जैसे कठिन राहों पर चलकर अन्य के लिए मार्ग सुगम बनाने के लिए निकला यह युवक वहीं था जिसने अपनी ताकतवर कलम से प्रशासनिक तंत्र को शर्म करो या श्रम करो जैसी पंक्तियां लिखकर जनहित में काम करने के लिए मजबूर किया था। जिंदगी से थका हूं, हारा नहीं हूं, के वाक्य दोहराने वाले धीरज बजाज का धैर्य किन परिस्थितियों में जवाब दे गया, ये प्रश्र समूचे शहरवासियों के लिए ऐसी रिक्ति है, जिसकी भरपाई संभवत: कभी हो सके। समाज के लिए समग्र विकास, नई दिशाएं, युवाओं के लिए रोजगारपरक राहों का ख्वाब देखने वाला धीरज ने स्वयं के लिए ऐसी दिशा चुनी जिस दिशा में मिलती है निराशा, पीड़ा, दर्द, आहें। दोस्त, तुम कहीं भी रहो मगर आपका हौंसला, जज्बा और अन्य को प्रेरित करने की भावना सदैव तुम्हें हमारे बीच जिंदा रखेगी।
जीवन में कुछ कर गुजरने की चाहत से चल रही थी जिदंगी...
पर पता हीं नहीं चला कब रूसवा हो गए जिंदगी से...

अंधा गांव में कनवां राजा : कौन दोषी: बिना कोर्ट के फैसले से विवादास्पद बहनों को ईनाम क्यों

1:57:00 PM
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लगता है हमारे देश में कानून बनाने वाले बुद्धिजीवी लोग भी नेताओ की तरह वोट या स्पोट लेने और अपनी नौकरी को नेताओ की जी हजूरी में लगाने की ताक में रह कर अपने आकाओं को खुश करने के लिए कानून बना कर लागू करवा देते है, लेकिन  भविष्य में भारत जैसे बड़े देश में जो भी नया  कानून बनाया जा रहा है उसका  का सही या गलत इस्तेमाल होगा इस बारे में शायद ही किसी नेता, या कानून बनाने वाले ने सोचा हो, इसके क्या परिणाम निकलेंगे किसी ने इसके विपरीत सोचने की कोशिश नही की !

क्या हमारे देश की सरकार या कानूनविदो ने कभी इस बात पर भी चर्चा की है की एक तरफा कानून बनाने से देश को कितना बडा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है, भारत में राजनीती की दलदल ने देश की जनता को भी अपने राजनीति फायदे के लिए ऐसा केंद्र बिन्दु तैयार कर दिया की भारत देश का हर आम आदमी अब घर से बाहर निकलने के लिए सौ बार सोचेगा, क्योंकि पुरुष प्रधान कहे जाने वाले भारत में अब पुरुषों का अस्तित्व नाम मात्र रह गया है, पुरुषों का अपना वजूद खत्म हो गया जो थोड़ा बहुत बचा है वह इस तरह के एक तरफा सोच वाले कानूनों से खत्म हो जाएगा !
                                                         अगर हमारे देश में राजनीतिक आकाओं को खुश करने का यही अफसरी तरीका कायम रहा तो वह दिन दूर नही जब भारत में हम पुरुष नामक प्राणी को ढूढ़ते रह जाएँगे, भारत आज 21 वीं शदी में प्रवेश करने की बात कर रहा है और सोच 15  वीं शदी की अपना रहा है, क्या यही है हमारे आधुनिक भारत की पहचान, कब सबक लेंगे हम, दुनिया की नजरों में तो भारत पहले ही इतना गिरा हुआ है की कुछ कहते और लिखते भी शर्म आती है, और रही सही कस्र हमारे देश का अँधा  कानून और राजनेता भारत को पुरुष विहीन बनाने की नीतिया लागू करवा कर पूरी कर देंगे.
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                           दहेज उत्पीडन कानून का हमारे देश में अनाप शनाप गलत इस्तेमाल हुआ यह सब जानते है, और अब भारत की पिछली कांग्रेस सरकार ने महिला उत्पीडऩ के खिलाफ कानून बना कर जो वाहवाही लूटी, अब उसका भी बेजा इस्तेमाल होना शुरू हो गया है या फिर यूँ कह लीजिये की  हो रहा है, महिला उत्पीडऩ नहीं होना चाहिए ये सही है, लेकिन क्या पुरुष का उत्पीडऩ होना चाहिए या नही इस बारे में देश की सरकार या कानून बनाने वालों ने कभी नही सोचा, क्या सिर्फ पुरुष ही  महिला का उत्पीडऩ करते है क्या महिला कभी पुरुष का उत्पीडऩ नही करती ऐसा नामुमकिन है क्योंकि आजकल भारत में महिला और पुरुष को बराबरी का दर्जा है पुरुषों की तरह महिलाएं भी हर क्षेत्र में अपनी भागीदारी कर रही है, हम आये दिन टीवी, और समाचार पत्रों में पढते है की फलां जगह एक माँ ने अपने बेटे से साथ ये किया, एक बहन ने ये किया, एक पत्नी ने अपने पति के साथ ऐसा किया, और इसी तरह पुरुषों के बारे में भी पढते और सुनते  है की फलां फलां जगह महिलाओँ के साथ इस तरह की घटनाये घटी, फिर भारत में एक तरफा कानून क्यों ?
पुरुष उत्पीडऩ के खिलाफ कानून क्यों नही ?  दहेज विरोधी कानून के गलत इस्तेमाल  होने की वजह से भारत की माननीय अदालत को आखिर संज्ञान लेना ही पड़ा और कहना पडा की हमारे देश में दहेज उत्पीडऩ कानून का गलत इस्तेमाल हो रहा है जिसके चलते माननीय अदालत ने दहेज उत्पीडऩ कानून में कुछ बदलाव भी किये, क्योंकि महिलाएं इस कानून का फायदा उठाने लगी थी, और ऐसा ही गलत इस्तेमाल होना शुरू हो गया है  महिला उत्पीडऩ कानून का क्योंकि जिस तरफ दहेज विरोधी कानून में पुरुष पक्ष  की एक  नही सुनी जाती थी उसी तरह हमारे देश के नए महिला उत्पीडऩ में भी पुरुष की नही सुनी जाती, महिला ने जो कह दिया वो सही क्योंकि देश का कानून महिला का पक्षधर है .
महिला चाहे कितनी भी गलत हो उसकी कही हर बात सही मानी जाती है और कानून के हिसाब से पुरुष कितना भी सच्चा और साफ सुधरा हो उसकी कही हर बात झूठ का पुलिंदा, पुरुष को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए सबूत जुटाने पड़ते है जबकि महिला का कहना ही उसके हक का सबूत है, कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं, आदमी बेबस कोई भी महिला आप पर राह चलते लगा सकती है छेड़छाड़ का इलजाम आप गलत और महिला सही मानी जाएगी।माना की सही और गलत का फैसला करना हमारे देश में माननीय अदालत का काम है और हमारी न्यायपालिका कर भी रही है, लेकिन सोच किसी की भी गलत हो सकती है महिला की भी और पुरुष की भी इसलिए कानून में दोनों पक्षों को समान अधिकार मिलना चाहये न्याय  एक तरफा नही, देश में पिछले कुछ वषों में महिला उत्पीडऩ की बहुत सी दर्दनाक घटनाएँ घटी जिसके लिए दुनिया भर में भारत को शर्मिंदगी उठानी पड़ी, देश की पिछली सरकार में अपनी नाकामयाबी छुपाने के लिए  देश की जनता पर बल इस्तेमाल किया, जिसका सारे देश में विरोध भी हुआ तब जाकर एक नया कानून जन्मा महिला उत्पीडऩ कानून, जिसमे किसी महिला का पीछा करना, घूर कर देखना, अपशब्द बोलना, छेड़छाड़ करना, बलात्कार करना.
जैसे अनेक शब्द जिसमें  किसी महिला की मानहानि होती हो के लिए कड़ी सजा का प्रावधान किया गया, लेकिन इस कानून में पुरुष उत्पीडऩ होता है किसी महिला द्वारा उसके लिए किसी बात का शायद कोई उल्लेख नही किया गया, इस नए महिला उत्पीडऩ कानून के चलते देश के कई नामी गिरामी लोग आज जेल की हवा खा रहे है, और कुछ आम जन  भी इस कानून की चपेट में  जेल की सलाखों के पीछे है जिन पर अभी उन पर फैसला होना बाकि है देश की कई माननीय अदालतों में ट्रायल चल रहा है लेकिन मेरी नजर में अभी तक देश भर में  कोई ऐसा केस सामने नहीं आया की पुरुष उत्पीडऩ के मामले में कोई महिला जेल में बंद हो  या जिस पर पुरुष उत्पीडऩ का केस चल रहा हो अभी पिछले दिनों हरियाणा के रोहतक में घटी घटना ने पुरे देश की जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया की महिला उत्पीडऩ कानून कहा तक सही है ?
गौरतलब है की पिछले कुछ दिन पहले 2 युवा लडकियों द्वारा  चलती बस में और पार्क में युवकों को पीटने और वाह वाही लूटने का मामला सामने आया जिसके चलते हरियाणा की नासमझ सरकार ने इन दोनों लड़कियों को ना केवल शाबाशी दी,बल्कि आनन-फानन में सम्मानित तक करने  का एलान कर डाला बिना मामले की तह तक जाये, की आखिर  मामला है क्या, कौन गलत और कौन सही किसी ने भी जानने और सोचने की जहमत नही उठाई, पुलिस भी  नाकारा साबित हुई  अपने आकाओं को खुश करने के लिए लड़कों को सलाखों के पीछे डाल दिया, लड़कियों को मर्दानी लड़कियों के नाम से नवाजा गया .
मामला सार्वजनिक हुआ, केस कोर्ट में गया, जज का फैंसला आना अभी बाकी था, विषय भी गहन विचार का था लेकिन हरियाणा पुलिस तो पहले ही बदनाम है और हरियाणा की नई भाजपा सरकार इस मामले को लेकर कटघरे में गिर गई, मामला सोशल मिडिया में पहुंचा , लड़कियों के कई वीडियो सामने आये, मामला वेहद पेचीदा बन गया लेकिन हरियाणा पुलिस की बेशर्मी कायम रही, हमारे देश  की एक महानता है की सौ गुनाहगार बच जाये एक निर्दोष को सजा नही होनी चाहिएलेकिन हरियाणा की बदनाम पुलिस  का रवैया चौकाने वाला था ऐसा लग रहा है की एक निर्दोष और सजा जरूर मिलनी चाहिए चाहे उसके लिए सौ गुन्हे गार बच जाये, इस मामले ने हमारे देश के कानून निर्माताओं को भी कटघरे में खड़ा कर दिया.
देश की सरकार, राज्य सरकार, नेताओ  को भी नही बक्शा  इस मामले ने इन सबकी सोच पर ऊँगली उठ गई, सुनने और देखने वालों  गवाहों के मुताबिक; मामला बस में सीट के  विवाद  का बताया जा रहा है परन्तु घटिया मानसिकता ने और मानवता के गिरते स्तर ने इसे छेड़छाड़ का मामला बना कर पेश क्या किया की हरियाणा में तूफान आ गया, मामले पर अभी कार्यवाही चल रही है नतीजा क्या होगा कोण गलत है कौन  सही यह तो जाँच के बाद ही सामने आएगा लेकिन आज जिस गंभीरता  इस मामले ने तूल पकड़ा है उसे देखते हुए महिलाओ की सुरक्षा के लिए बनाये गए कानून का गलत इस्तेमाल हो रहा है इस मामले को देख कर तो ऐसा ही प्रतीत हो रहा है, क्योंकि बस छेड़छाड़ का मामला जैसे ही सामने आया ठीक उसके कुछ समय बाद इन्ही लड़कियों का एक और वीडियो सामने आया जिसमें ये लड़किया. एक पार्क में किसी लड़के की पिटाई कर रही थी जो उस समय बेंच पर बैठा दिखाई दे रहा था. इसलिए  आखिर माजरा है क्या, ये मर्दानी लडकिया गंदी गंदी गालिया दे रही है क्यों, सभी छेड़छाड़ की घटनाएँ इन्ही 2 लड़कियों के साथ क्यों हो रही है और इनका वीडियो कौन बना रहा है, क्या ये सब एक सोची समझी साजिश है इन लड़कियों की, जो इस तरह की घटनाओं को अंजाम देकर सुर्खियों में रहना चाहती है या फिर कोई राजनितिक षड्यंत्र !
हरियाणा के रोहतक की जिन लड़कियों की बहादूरी को सभी जगह कसीदे पढ़े जा रहे हैं,  इन लड़कियों के गांव की ही कुछ महिलाओं ने लड़कों के समर्थन में कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। आरोपी युवक गांव आसन निवासी कुलदीप, दीपक और मोहित के पक्ष में 5 महिलाएं मंगलवार को कोर्ट पहुंच गई और उन्होंने लड़कों के समर्थन में गवाही दी। मीडिया के सामने दिए अपने बयानों में इन महिलाओं ने दावा किया कि वे बस में सवार थीं और सारा झगड़ा सीट को लेकर हुआ।
उन्होंने न केवल आरोपी युवकों के वकील को एफिडेविट दिया, बल्कि एसपी के सामने बयान भी दर्ज कराए। कुलदीप के ताऊ रामचंद्र का कहना है कि लड़कों को झूठा फंसाया गया है। लड़कियों ने खुद ही वीडियो बनवाया है। चलती बस में तीन युवकों की धुनाई के मामले में नया मोड़ आ गया है। एक तरफ तो जहां लड़की के गांव की ही कुछ महिलाएं लड़कों के समर्थन में कोर्ट पहुंच गई हैं, वहीं बहादुर बहनों का एक और वीडियो सामने आया है। उधर आरोपी युवक गांव आसन निवासी कुलदीप, दीपक और मोहित के पक्ष में 5 महिलाएं मंगलवार को कोर्ट पहुंच गई और उन्होंने लड़कों के समर्थन में गवाही दी।
कुलदीप के ताऊ रामचंद्र का कहना है कि लड़कों को झूठा फंसाया गया है। लड़कियों ने खुद ही वीडियो बनवाया है।आरोपी पक्ष के वकील संदीप राठी ने बताया कि बस में सवार गांव गढ़ी सिसाना की बिमला देवी पत्नी ईश्वर ने एफिडेविट में कहा है कि उसने लड़कों से टिकट मंगवाई थी। तीन नंबर सीट दी गई।
जबकि आठ नंबर सीट पर एक बीमार महिला को बैठाना था। इसी सीट पर दोनों लड़कियां बैठी हुई थीं। बिमला के मुताबिक लड़कों ने लड़कियों से बीमार महिला को सीट देने के लिए कहा तो उन्होंने मना कर दिया। वकील राठी ने बताया कि बुधवार को भी बस में सवार कुछ अन्य लोगों को बुलाया जाएगा। ताकि मामला साफ हो सके। इधर, गांव थाना खुर्द की ही एक अन्य महिला संतोष ने एफिडेविट के जरिए लड़कियों पर कई आरोप लगाए हैं। हरियाणा सरकार  ने बिना किसी नतीजे और बिना किसी सोच के लडकियों को सम्मानित करने का एलान कर खुद को हीरो बनाने की कोशिश की .
सवेदनशील  राज्य उत्तर प्रदेश जिसमें महिला तो क्या कोई पुरुष भी सुरक्षित नही है की एक महिला जो दुर्भाग्य से वहां के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी है ने भी इन लडकियों को बिना अदालत का फैंसला आये और बिना मामले की गहराई तक जाए सम्मानित करने का एलान कर दिया, क्या ये सही है, क्या पुरुष की कोई इज्जत नही है ?  क्या इस मामले में  जिन लडकों पर उंगलिया उठी उनकी कोई इज्जत नही है, क्या समाज में  यह सब होना उचित है यह तो भविष्य के गर्व में है लेकिन महिला उत्पीडऩ  कानून का वेजा इस्तेमाल हो रहा है इस पर बहस होगी या नही क्या देश से ऐसे कानून के चलते पुरुष सासमाज का अस्तित्व खतरे मै है
RK.AGARWAL
राजकुमार अग्रवाल पत्रकार
संपादक  अटल हिन्द
पत्रकार  हिन्दुस्थान समाचार
28 इ ब्लॉक विष्णु मार्किट कैथल हरियाणा
09416111503

भोपाल गैस कांड: 30 साल बीत गए, आज तक नहीं मिला न्याय

11:41:00 AM
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दिसम्बर का माह भोपाल की आबो-हवा कमायत के दिन तक नहीं भुला सकती या यू कहे कि वो तो कयामत को देख चुकी थी। 2दिसम्बर 1984 की आधी रात को युनियन कारबाईड नाम की दानवी कम्पनी से निकली जहरीली गैस ने हजारों लोगों का मौत के घाट उतारा व लाखों को विकलागता के नरक में धकेल दिय। पशु-पक्षी वनस्पती कोई भी इसे विष से अछुती नहीं रही। भोपाल गैस त्रास्दी देश ही नहीं विश्च की उन अनेक मानव जनित आपदाओं में से एक है, जिसमें मानवता और पर्यावरण को बुरी तरह से नुकसान पहुचाया। चन्द मुनाफे के लिए युनियन कारबाईड ने सुरक्षा यन्त्रों को दुरस्त नहीं रखा जिसकी वजह से यह हादसा हुआ। अब जब भोपाल गैस त्रास्दी की 30वी बरसी पर मानवता खून के आंसू रो रही है। वही कम्पनी विश्व के अन्य देशों में अभी भी स्वतन्त्रता से अपना व्यापार चला रही है। मुख्य आरोपी एंडरसन ऐश की जिन्दगी जी कर अपनी मौत मारा गया। भोपाल गैस पीडितों की कहानी जाने तो दिल रो पडता है लगता है कि आजाद देश की 1984 से लेकर अब तक की कोई भी सरकार गैस काण्ड के दोषियों को सजा नहीं दे पाई और ना ही गैस पीडितों के आंसु पोछ पाई। 
क्या है भोपाल गैस कांड
                  भोपाल में सन 1969 मे यू.सी.आइ.एल.कारखाने का निर्माण हुआ जहाँ मिथाइल आइसोसाइनाइट नामक पदार्थ से कीटनाशक बनाना आरम्भ हुआ। वर्ष 1979 मे मिथाइल आइसोसाइनाइट के उत्पादन के लिये नया कारखाना खोला गया। नवम्बर 1984 तक कारखाना में कई सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था। स्थानीय समाचार पत्रों की रिपोर्टो अनुसार सुरक्षा के लिए रखे गये सारे मैनुअल अंग्रेज़ी में थे जबकि कारखाने में कार्य करने वाले अधिकतर को अंग्रेजी का ज्ञान नहीं था। समस्या यह थी कि टैन्क संख्या 610 मे नियमित रूप से ज्यादा एमआईसी गैस भरी थी तथा गैस का तापमान भी निर्धारित 4.5 डिग्री की जगह 20 डिग्री था। दिनांक 2-3 दिसम्बर की रात को टैन्क इ-610 मे पानी का रिसाव हो जाने के कारण गर्मी व दबाव पैदा हो गया और टैन्क का अन्तरूनी तापमान 200 डिग्री के पार पहुच गया जिससे विषैली गैस का रिसाव वातावरण मे हो गया। 45-60 मिनट के अन्तराल लगभग 30 मेट्रिक टन गैस का रिसाव हो गया। कम्पनी के अधिकारी एडंसन ने बाद में इसे किसी साजिश का नाम भी देना चाहा पर भारतीय वैज्ञानिकों की जांच व मजदूर संस्थाओं की जांच में तथ्य कुछ और ही निकल कर आए। जिससे ये साबित हो गया कि कम्पनी की मुनाफा खोर निती के चलते यह सब हुआ। हादसे के समय सुरक्षा यंत्र व सुरक्षा चेतावनीयां नकारा थी जिनका मौके पर इस्तेमाल नहीं हो पाया। मजदूरों द्वारा कम्पनी को दी गई गैस रिसाव की सुचना को भी नजरअन्दाज किया गया। वही गैस फैलने के बाद तक कम्पनी इसे छुपाती रही की गैस जहरीली है पर जब मरीजों से अस्पताल भरने लगे, बाहर लाशों के ढेर लग गए तभी उन्होंनें इस बारे में बताया गया कि यह मिथाइलआइसोसाइनाइट (मिक) नामक जहरीली गैस थी 
भोपाल गैस कांड के पीडि़त
                    अनुमान बताते हैं कि 8000 लोगों की मौत तो दो सप्ताहों के अंदर हो गई थी और लगभग अन्य 8000 लोग तो रिसी हुई गैस से फैली संबंधित बीमारियों से मारे गये थे। वर्ष 2006 में सरकार द्वारा दाखिल एक शपथ पत्र में माना गया था कि रिसाव से करीब 558,125सीधे तौर पर प्रभावित हुए और आंशिक तौर पर प्रभावित होने की संख्या लगभग 38,478 थी। 3900 तो बुरी तरह प्रभावित हुए एवं पूरी तरह अपंगता के शिकार हो गये। वर्ष 2004 तक साढ़े तीन लाख से ज्यादा गैस रिसाव के कारण बीमारी की चपेट में आए। जिसका प्रभाव अभी भी है इसी कारण वर्ष 1993 में इसे भोपाल त्रास्दी पर बनाए गऐ भोपाल-अंतराष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को पर्यावरण व मानव समुदाय पर होने वाले दीर्घकालिन प्रभाव को जानने का काम सौंपा गया। 
भोपाल कांड का न्याय
                   सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी और 15 हजार से ज्यादा जानें छीनने वाली व पांच लाख से ज्यादा लोगों को प्रभावित करने वाली इस नरसंहारक घटना की मुआवजा राशि मात्र 713 करोड़ रुपये दी गई। अर्थ था हर पीडित तक मात्र 30 से 35 हजार रूपए। दुर्घटना के 4 दिन बाद 7 दिसम्बर 1984 को यु सी सी अध्यक्ष और सी ई ओ वारेन एन्डर्सन की गिरफ्तारी हुई परन्तु 6 घन्टे बाद ही उन्हें मामूली जुर्माने पर छोड दिया गया। त्रास्दी के 2 दिन बाद राज्य सरकार ने राहत कार्य आरम्भ किया । जुलाई 1985 मे मध्य प्रदेश के वित्त विभाग ने राहत कार्य के लिये लगभग एक करोड़ चालीस लाख डॉलर दी। अक्टूबर 2003 के अन्त तक भोपाल गैस त्रासदी राहत एव पुनर्वास विभाग के अनुसार 554,895 घायल लोगो को व 15,310 मृत लोगों के वारिसों को मुआवज़ा दिया गया है। बैगर किसी जातीय भेदभाव के हिन्दू-मुस्लिम सहयोग से कार्य आरम्भ हुआ। श्री सतिनाथ सारङी का जिन्होने पीडितों कि राहत के लिये सम्भावना ट्रस्ट नामक संस्था भी तैयार की। अभी भी समय-समय पर भोपाल गैस पीडित अपने हकों के लिए आवाज बुलन्द करते रहे है वही एक नई फिल्म भी 30वी बरसी पर आ रही है जिससे दुबारा विश्व का ध्यान इस और गया है। अभी भी राजधानी में जंतर-मंतर पर आप भोपाल गैस पीडितों को न्याय के लिए गुहार लगाता देख सकते है। 
आज मानव विज्ञान से दुनिया जीत रहा है पर वहीं मुनाफाखोरी की नितियों ने मानवता को कोसों दूर छोड दिया है जिसका नतीजा है विज्ञान का इस्तेमान कुछ धनाडय पैसों की खेती करने में लगे हुए है उन्हें ना तो भोपाल पीडितों से मतलब है ना ही किसी मानवता के अर्थ से। वो कानून के जाल को कुतरने का इन्तजाम भी कर लेते है। भोपाल गैस त्रास्दी बहुत कुछ सीखने की ओर इशारा करती है। बहुत अच्छा होगा अगर हम समय रहते इसे समझे जिससे मानव व पर्यावरण दोनों बचे रहे। यही भोपाल गैस में मारे गए लोगों के साथ विश्व में अन्य रासानियक रिसावों से मरने वालों के लिए सच्ची श्रंदाजलि होगी। भोपाल न्याय के लिए सवाल लगातार उठा रहा है जिसका जवाब 30साल बाद भी उसे नहीं मिला।(नवल सिंह, प्रैसवार्ता)

देशभक्त की फिल्म देश में नहीं हो पाई प्रदर्शित

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आजादी के संघर्ष में शहीद उधम ङ्क्षसह का अधिकतर समय गुमनामी में गुजरा जिसके बारे में जब भी कोई नई जानकारी मिलती है तो मन होता है उसे सभी से सांझा किया जाए इसी तरह की एक जानकारी एक लेख में मिली।  एक अंग्रेजी  दैनिक पत्र समाचारमें बलवन्त ङ्क्षसह द्वारा लिखित लेख में दी गई जानकारी बेहद महत्वपुर्ण है। उन्होंने अपने अध्यन्न के दौरान खुलासा किया कि उधम ङ्क्षसह ने दो चर्चित फिल्मों में काम किया जिसकी आमदन को उन्होंने गदर पार्टी को दे दिया ताकि भारत देश की आजादी की लड़ाई को तेज किया जा सके । इसके साथ ही उन्होंने एक अन्य चौकाने वाली जानकारी दी कि उधम ङ्क्षसह ने 48 दिन की लम्बी भुख हड़ताल भी की थी। बलवन्त ङ्क्षसह अपने लेख में लिखते है कि रॉग फ्रिकिं ग ब्रिटिश लेखक ने इसे अपनी पुस्तक में लिखा है कि माईकल ओ डायर को गोली मारने से तीन साल पहले उन्होंने दो इग्लिश फिल्मों में अभिनय किया जिसमें पहली अलिफेट बॉय-1937 और दूसरी फोर फेदर-1939 है। बेहद खास बात ये रही कि इन फिल्मों से प्राप्त आमदन को उधम ङ्क्षसह ने गदर पार्टी को समर्पित कर दिया।  फिल्मों का निर्देशन व निर्माण एलेकजैन्डर कोरडा व उनके छोटे भाई जोलटन कोरडा ने किया जो उस समय के प्रसिद्ध निर्माता थे। रॉग फ्रिकिं ग एक प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखक है जिन्होंने पहली बार इस तथ्य से अपनी पुस्तक -द अमतृसर लिगसी- 1989 में लिखा है। रॉग लिखते है कि लंदन में गदर पार्टी के पास अपनी गतिविधियां चलाने के लिए फंड का अभाव था। उधम ङ्क्षसह ने नॉन-युरोपियन इक्सट्रा अभिनेता के तौर पर दो फिल्मों में काम किया था। जिससे प्राप्त आमदन को गदर पार्टी का दे दिया गया।
ऐलिफेन्ट बॉय एक बिट्रिश एडवेंचर फिल्म टूमल ऑफ ऐलिफन्ट -जंगल बुक, पुस्तक जिसे रूडयार्ड
नवल सिंह
किपलिंग द्वारा लिखत पुस्तक पर अधारित है। यह फिल्म सोशल नेटवर्क साईट यू टयूब पर भी उपलब्ध है। फिल्म को लंदन फिल्म स्टूडियों डेनम और मंसूर में फिल्माया गया। फिल्म को 14 देशों में 9अप्रैल 1937 को  रिलिज की गई। पर यह फिल्म कभी भी भारत में पदर्शित नहंी की गई। फिल्म ने बेहतर निर्देशन के लिए विनिस फिल्म फेसटिवल में अवार्ड को भी जीता।
इस तरह से उधम सिंह की लम्बी भुखहड़ताल का जिक्र करते हुए भारतीय रेलवे में सिनियर इंजिनियर के पद पर कार्यरत राकेश कुमार ने अपनी पुस्तक आजादी दी शंमा दा परवाना-महान गदरी इंकलाबी शहीद उधम ङ्क्षसह में कुछ अलग तथ्यों से परिचित करवाया है। बिट्रिश दस्तावेजों को आधार बना राकेश कुमार लिखते है कि उधम ङ्क्षसह ने क्रिसटन हॉल में 13मार्च 1940 को माईकल-ओ-डायर को केवल जलियावाला बांग के लिए दोषी करार कर गोली नहीं मारी थी ब्लकि लम्बे समय तक पंजाब में अंग्रेजी शासन व्यवस्था से उधम ङ्क्षसह व्यधित थे। यह अंग्रेजी शासन व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह था। 
बिट्रिश दस्तावेज बताते है कि माईकल ओ डायर को  मारने से 13साल पहले उधम ङ्क्षसह को 30अगस्त 1927 में उन्हें पिस्तोल व गदर की गुंज पुस्तक की प्रतियां को रखने के आरोप में गिरफतार किया गया था। जिसमें उनपर सेक्शन-20 ऑफ द आर्म एक्ट और पांच साल की सजा दी गई। गदर डायेक्टरी में जिसे डायेक्टर विजिलेंस ब्यूरों होम डिर्पाटमेंट इण्डिया ने 1934 में लिखा है कि भारत में गदर पार्टी के आन्दोलन को जिन्होंने चलाया व भागेदारी की उसमें उधम ङ्क्षसह का नाम पेज 267 एस-44 पर है। राकेश कुमार दस्तावेज पर आधारित इस जानकारी को 1994 सामने लाए। 31 जुलाई 1940 को फांसी पर चढाए जाने से पहले बिट्रिश सरकार ने दस्तावेज में बताया कि उधम ङ्क्षसह ने लगातार 42 दिनों की भुख हड़ताल 1940 में की थी। 
साम्प्रदायिकता के इस महौल में उनके बारे में उनकी अन्तिम वसियत का जिक्र करना बेहद महत्पुर्ण है प्रसिद्ध लेखक प्रो.जगमोहन ने एक कार्यक्रम के दौरान मुझसे किसी विषय पर चर्चा के दौरान कहा था कि उधम सिंह ने जात-बिरादरी से ऊपर उठ कर अपने फांसी चढने से पुर्व खुद को नया नाम राम महोमद सिंह आजाद दिया व कहा कि मुझे भविष्य में इसी नाम से पुकारा जाना चाहिए। उसके बाद मैं तो अपने स्तर पर हर उधम सिंह के विषय में लिखे लेख या किसी मंच पर मौका मिले तो इस बात का जिक्र जरूर करता हँू। अगर आप भी ऐसा ही करेगे तो निश्चित है उनकी यह अनुठी वसीयत साम्प्रदायिकता को जड़ को उखाडऩे का माहौल पैदा करेगी।(नवल सिंह, प्रैसवार्ता)
 
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