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हरियाणा, जहां भूपेंद्र खेमे ने उठाई कांग्रेसी नेतृत्व में परिवर्तन की मांग

(तंवर ने दी हरियाणवी कांग्रेस को संजीवनी)
सिरसा(प्रैसवार्ता)। लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव में हरियाणा कांग्रेस की हुई दुर्गति और कांग्रेसीजनों के मायूस चेहरों पर  पर रोशनी लाने के लिए मौजूदा कांग्रेस प्रधान अशोक तंवर के परिश्रम और प्रयासों से हरियाणवी कांग्रेस को संजीवनी मिली है। बेशक प्रदेश में कांग्रेस पार्टी को मिले राजनीतिक घाव नहीं भरे है, मगर तंवर ने उन पर मरहम जरूर लगाई है। हरियाणा के अस्तित्व में आने उपरांत अशोक तंवर हरियाणा कांग्रेस के पहले प्रदेशाध्यक्ष है, जिनका रिमोट किसी ओर के हाथ में नहीं है, जबकि इससे पूर्व ज्यादातर प्रदेशाध्यक्षों का रिमोट किसी ओर के हाथ में रहा है। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन उपरांत हरियाणवी राजनीतिक तस्वीर को गहराई से देखने उपरांत कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने भूपेंद्र हुड्डा को तव्वजों देनी बंद कर दी। भूपेंद्र हुड्डा ने अपने शीर्ष नेतृत्व को विश्वास पात्र बनने के लिए कई राजनीतिक घौडे दौडाए, मगर सभी पिट कर वापिस लौटे। भूपेंद्र हुड्डा को मिल रहे निरंतर राजनीतिक झटकों से उनके अपने ही दूरी बनाने लगे, तो हुड्डा पर दवाब बढ़ गया कि कांग्रेस आलाकमान यदि उन्हें तव्वजों नहीं देता, तो नया राजनीतिक दल बना लिया जाए। मगर भूपेंद्र हुड्डा जानते है कि नई राजनीतिक दुकानदारी चलाना आसान नहीं है। इससे पूर्व स्व. बंसीलाल की पार्टी हरियाणा विकास पार्टी दम तोड़ चुकी है, जबकि स्वर्गीय भजन लाल की पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस पति-पत्नी तक ही सीमित होकर रह गई है। भूपेंद्र हुड्डा की सोच है कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को विश्वास में लेकर दीपेंद्र हुड्डा को हरियाणवी राजनीति में स्थापित किया जाए। इनैलो सुप्रीमों ओम प्रकाश चौटाला और इनैलो के युवा कमांडर अजय चौटाला को दस दस वर्ष की कैद के चलते भूपेंद्र हुड्डा  ने एक विशेष वर्ग का चौधरी बनने का प्रयास किया, मगर सफल नहीं हो पाए। हरियाणा में हुए जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान उनके राजनीतिक सलाहकार वीरेंद्र सिंह के ऑडियो वायरल होने से भूपेंद्र हुड्डा को गहरा सदमा लगा, जो अपनों से ही उन्हें मिला है। ऑडियो वायरल ने हिचकौले खा रहे भूपेंद्र हुड्डा के राजनीतिक भविष्य पर कई सवालिया निशान बना दिए है। अपनी ही पार्टी में निरंतर राजनीतिक झटके बदर्शत कर रहे भूपेंद्र हुड्डा ने अंतिम राजनीतिक अस्त्र भी अपनी मियान से बाहर निकालकर अपने विधायक समर्थकों को नेतृत्व परिवर्तन की ध्वज थमा दिया। भूपेंद्र हुड्डा समर्थकों की मांग पर कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व क्या निर्णय लेता है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, मगर इस बात से राजनीतिक पंडित इंकार नहीं करते कि यदि भूपेंद्र हुड्डा का यह राजनीतिक अस्त्र भी सफल न हुआ, तो उनके लिए कांग्रेसी ध्वज उठाना मुश्किल हो जाएगा। हरियाणवी राजनीति का इतिहास इसका गवाह है कि जिस राजसी दिग्गज ने भी कांग्रेस से अलविदाई लेकर अपना अलग ध्वज उठाया, उसके हाथ में सिर्फ ध्वज ही रह गया, क्योंकि टांगने वाले डंडे को जनता ने अपने ही पास रखा और बगैर डंडे के वह ध्वज फहराने से पहले ही ठंडे बस्ते में चला गया।

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