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नगर परिषद चुनाव में कांग्रेस हारी, मगर कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष हुए विजयी

सिरसा(प्रैसवार्ता)। 25 सितंबर को हुए नगर परिषद सिरसा के चुनाव परिणाम में कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन भले ही फीका रहा हो, लेकिन कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. अशोक तंवर को जरूर राजनीतिक फायदा पहुँचा है। संसदीय क्षेत्र सिरसा से सांसद रहें अशोक तंवर और कांग्रेसी दिग्गज अपने अपने वार्डों में कांग्रेस समर्थित प्रत्याशियों को सफल नहीं करवा सके। विजयी पार्षदों को कांग्रेस के नाते जीत हासिल नहीं हुई, बल्कि विजयी पार्षद अपने अपने रसूख से सफल हुए है। तंवर के मीडिया एडवाइजर अमित सोनी ने कांग्रेस लिबादा औढऩे की बजाये बतौर आजाद उम्मीदवार चुनाव लड़कर अपनी धर्मपत्नी नीतू सोनी को जीत दिलवाई है और वह भी उस परिवार की उम्मीदवार से, जिसका तीन दशक से वार्ड पर भारी प्रभाव रहा है। परिषद चुनाव में कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन भले ही फींका रहा हो, मगर अशोक तंवर ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के समर्थकों को अपने खेमे में लाकर दिखा दिया है कि वह भूपेेंद्र सिंह हुड्डा के राजनीतिक पर कुतरने के बाद उनके चहेतों को भी हुड्डा से अलग-थलग करने की योजना रखते है। जग-जाहिर है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का अशोक तंवर से छत्तीस का आंकड़ा है। भूपेंद्र हुड्डा और उनके चहेतों को राजनीतिक झटके देने में तंवर की सक्रियता तेजी पकड़े हुए है। भूपेंद्र हुड्डा को राजनीतिक तौर पर हाशिये पर लाने के बाद तंवर का अगला फोक्स भूपेंद्र हुड्डा के चहेतों पर है। तंवर कांग्रेस पार्टी को मजबूत करने तथा कांग्रेसी जनाधार बढ़ाने की बजाये भूपेंद्र हुड्डा और उसके चहेतों को राजनीतिक तौर पर खुड्डे लगाने का अभियान छेड़े हुए है। तंवर के इस अभियान से कांग्रेसीजन उलझन में है, तो वहीं भाजपाई कुनबा तेजी से बढ़ रहा है। तंवर की भूपेंद्र हुड्डा के खिलाफ शुरू की गई राजनीतिक जंग से कांग्रेस में बिखराव के आसार बन चुके है। कांग्रेस को मजबूती मिले या नहीं, जनाधार बढ़े अथवा नहीं, तंवर का एक ही फोक्स भूपेंद्र हुड्डा और उनके चहेतों को राजनीतिक घाव देना, जोकि कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता।

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